मगर कारोबार नगदी और उधारी दोनों से चलता है – कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु

 


धनतेरस के त्योहार की ख़ासियत कैसे बताऊं तुमको !

सड़क पर राह नहीं चलने को बाज़ार इस कदर फैला !!

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चाहता हर कोई है कि धनतेरस में तरक्क़ी हो !

मगर तरक्क़ी त्योहार से नहीं कर्म से होती है !!

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धनतेरस का त्योहार खुशियों का संकेत देता है !

शर्त है कि तन मन से धन कमाना सीखो तुम !!

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धनतेरस में यूं तो सारे कारोबारी नगदी की सोचते हैं !

मगर कारोबार नगदी और उधारी दोनों से चलता है !!

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हर तरफ़ बाज़ार में नगद नगद का शोर दिखता है !

जेब ढीली है जिसकी धनतेरस और दिवाली मनाये कैसे !!

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महंगाई की मार से त्रस्त है दुकानदार और ख़रीदार दोनों !

धनतेरस और दिवाली का पर्व हंसी खुशी के साथ बीते तो बड़ी बात समझो !!

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एक बेचारा बाज़ार गया था धनतेरस का शगुन करने !

एक जेबकतरा अपना शगुन कर लिया जेब काट उसकी !!

***********तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !

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