मैं वह फूल नहीं जो कांटों की दुर्दशा देखूं - कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु

 


फूल और कांटो के दरमियां गुजरती है ज़िंदगी सबकी ! 

फूल और कांटे दोनों ही ज़िंदगी की क़ीमत बताते हैं !!

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फूल खिल कर लोगों को मुस्कुराने का संदेश देते हैं ! 

मगर कांटे तो फूलों की हिफाज़त का संदेश देते हैं !! 

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फूल मिले हैं ज़िंदगी में तो कांटे भी ज़रूर मिलेंगे ! 

फूल और कांटे का याराना यह दुनिया जानती है !! 

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तुम चाहो तो मुझसे रिश्ता जोड़ सकते हो ! 

मैं वह फूल नहीं जो कांटों की दुर्दशा देखूं !! 

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तुम्हारे शहर में फूलों की तमाम दुकानें देखी हैं हमने ! 

हमारे गांव में फूल और कांटे साथ-साथ मिलते हैं !! 

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ज़िंदगी का कोई तौर तरीका मुझको भी बताओ ! 

हमें कभी फूल तो कभी कांटे दोनों तंग करते हैं !! 

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भला मैं कैसे कहूं तुमसे कि मैं बहुत परेशान हूं ! 

मेरे पास फूल हैं तुम्हारे पास तो कांटे ही कांटे !!

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ज़िंदगी की जंग में मेरा साथ देगा कौन ! 

यूं तो मेरे पास फूल और कांटे दोनों हैं !! 

***************** तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !

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