गजलों की महफ़िल(दिल्ली) की 35वी कड़ी में मेरठ की शायरा डॉ यास्मीन मूमल ने शानदार और जानदार ग़ज़लो का गुलदस्ता पेश किया,श्रोताओं ने जमकर तारीफ और हौसला अफजाई की

साहित्य::वर्तमान कोरोना काल के कारण एक ओर जहाँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आयी विसंगति और ठहराव का असर साहित्यिक-साँस्कृतिक क्रियाकलापों पर भी पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर साहित्यिक-साँस्कृतिक हलचलें ही इस जड़ता को तोड़ भी रही हैं। अगर विभिन्न भाषाओं के साहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों द्वारा वर्ष भर चलाये जाने वाले कवि सम्मेलनों, मुशायरों, सम्मान समारोहों समेत हर प्रकार के आयोजनों पर अभी तक रोक लगी हुई है तो दूसरी तरफ़ आभासी दुनिया में ऐसी गतिविधियों की बाढ़ सी आयी हुई है। कहते हैं न कि मनुष्य की अदम्य जीजिविषा उसे हर परिस्थिति का अनुकूलन करने में सक्षम बना देती है, सो हम सबने इस भीषण अवसाद की घड़ी में भी ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने के लिये नये-नये रास्तों की तलाश कर ली है। ज़िंदगी की इसी खोज़ का परिणाम है कि नवीन संचार माध्यमों का सहारा लेकर हम अपने-अपने घरों में क़ैद होते हुये भी वेबीनार या साहित्य-समारोहों का आयोजन कर रहे हैं। इसीलिए हम देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से साहित्यिक-साँस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के निमित्त फेसबुक लाइव एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। फेसबुक लाइव के माध्यम से हम अपने पसंदीदा कवियों-शायरों से रूबरू होकर उनकी रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।


इसी क्रम में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में लगी हुई ऐतिहासिक संस्था "पंकज-गोष्ठी" भी निरंतर क्रियाशील है। "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के तत्वावधान में चलने वाली प्रख्यात साहित्यिक संस्था "गजलों की महफ़िल (दिल्ली)" भी लगातार आॅनलाइन मुशायरों एवं लाइव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के अध्यक्ष डाॅ विश्वनाथ झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि "न्यास" की ओर से हम भारत के विभिन्न शहरों में साहित्यिक और साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते रहे हैं। परंतु करोना के कारण उपजे हालात में अभी "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत) के कार्यक्रम भी स्थगित कर दिये गये हैं, लेकिन आभासी दुनिया में न्यास पूर्ण सक्रिय होकर आपनी भूमिका निभा रहा है। इसीलिए "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" अपनी बहुचर्चित और समादृत साहित्यिक संस्था  "ग़ज़लों की महफिल (दिल्ली)" की ओर से विगत कई महीनों से लगातार लाइव कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" के नाम से बहुचर्चित यह लाइव कार्यक्रम देशभर के प्रख्यात शायरों और आम ग़ज़ल-प्रेमियों द्वारा खूब सराहा जा रहा है।


इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए पवित्र शारदीय नवरात्र की प्रथम तिथि, प्रतिपदा (शनिवार, 17 अक्तूबर 2020) से लाइव@ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के कार्यक्रम में कुछ परिवर्तन लाया गया है और इसी परिवर्तन के साथ यह कार्यक्रम श्रृंखला अपने चौथे चरण में प्रवेश कर गयी है।


लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की इस कार्यक्रम श्रृंखला को नया रूप देते हुए देवीपक्ष से शुरु हुए इस चौथे चरण को "मातृ शक्ति" को समर्पित किया गया है। "स्त्री-सशक्तिकरण" की दिशा में अदब की दुनिया में किये गए एक छोटे, परंतु अनेठे प्रयास के तहत ही ऐसा निर्णय ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) ने लिया है। अतः तय किया गया है कि इस चतुर्थ चरण में सिर्फ़ शायरात को ही ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का यह प्रतिष्ठित मंच प्रदान किया जायेगा।


इसी क्रम में चतुर्थ चरण के कार्यक्रम में लाइव @ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की 35 वीं प्रस्तुति के रूप में, शनि वार,6 नवंबर 2020, शाम 4 बजे से मेरठ (यू पी) की शायरा डाॅ यास्मीन मूमल जी ने महफ़िल के पटल पर अपनी बेहद ख़ूबसूरत आवाज़ में मुहब्बत का रंग बिखेरने वालीं नायाब ग़ज़लें सुनाई और आज की शाम को यादगार शाम बना दिया। उन्होंने लगभग डेढ़ घंटे तक अपनी मोहक अंदाज़ में और बेहद ख़ूबसूरत स्वर में तरन्नुम में अपनी बेहतरीन ग़ज़लें सुनाकर दर्शकों-श्रोताओं को बाँधे रखा तथा सभी उनकी तारीफ़ में वाह वाह करते चले गये।



ठीक 4 बजे डाॅ यास्मीन साहिबा पटल पर उपस्थित हो गईं और तबसे लेकर अगले डेढ़ घंटे एक से बढ़कर एक ख़ूबसूरत क़लाम सुनातीं रहीं।


जब उन्होंने अपनी ग़ज़ल:


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आई मुश्को गुलाब की ख़ुशबू।


मेरे आक़ा तिरे पसीने से।।


लोग लब्बैक कह के पहुँचे हैं।


जब भी आई सदा मदीने से।।


सुनाया तो महफ़िल का माहौल धार्मिक भावनाओं में ढल गया फिर उनकी ग़ज़ल


ख़ुद को मुझमें बसा गए हो तुम।


रूह में यूँ समा गए हो तुम।।


याद हर वक़्त आते रहते हो।


जब से नज़रें मिला गए हो तुम।।


की भावनाओ में जैसे खो गए आगे डाॅ यास्मीन मूमल जी की इस खूबसूरत ग़ज़ल:


जो बुराई के मुक़ाबिल आ गए मैदान में।


सोच कर अंजाम उनके दिल में डर आता नहीं।।


देखकर तस्वीर दिल बहला रहे हैं वालिदैन।


लौटकर परदेस से नूरे नज़र आता नहीं।।


और


 ग़में-ए हयात में मुस्कान बन के आए हो।


ख़िजां के दौर में रंगे बहार लाए हो।।


मेरे नसीब से जलने लगीं बहुत सखियाँ।


दयारे-ए हुस्न में जब से गले लगाए हो।।


से परदेश गए बच्चो की यादें ताज़ा हो गई और दूसरी ग़ज़ल से सखियों की जलने की याद इस दौर से गुजरने वाली लड़कियों के दिल की बात कह गई


रेप वही, दुष्कर्म वही।


वहशी तेवर बदले क्या।।


मैं भी चुप हूँ तू भी चुप।


होंटों पर हैं ताले क्या।।


से आज के दौर की वहशियत को उकेरने में सफल रहीं


दौर-ए- ख़िज़ां में आइये हम सब दुआ करें।


पंछी हों जिस पे प्यार के ऐसा शजर मिले।।


जिसकी सुहानी याद के परचम हैं चार सू।


हमको रहे हयात में वो भी बशर मिले।।


तथा


करके रोशन चराग़ तूफ़ां में।


अपनी हिम्मत को आज़माते हैं।।


आस्तां है जहां मुहब्बत का।


"यास्मीं" सर वहीं झुकाते हैं।।


इन दोनों गजलों से डॉ यास्मीन जी ने मोहब्बत का पैगाम दिया,और आगे की इन गजलों ने


सैकड़ों अरमान डूबेंगे अगर।


ले चले सैलाब अपनी ज़िंदगी।।


नर्म-ओ-नाज़ुक़ हाथ से छूना सदा।


है पर-ए-सुर्खाब अपनी ज़िंदगी।।


और


रहेंगे उनसे क़ायम क़ुर्बतों के सिलसिले सारे।


मिटा देगा गुज़रता वक़्त ग़म के मसअले सारे।।


रहे पुरख़ार पे चलकर पहुँचती हूँ जो मंज़िल पर।


ख़ुशी से झूमने लगते हैं दिल के आबले सारे।।


लोगो को यास्मीन जी की सोच की गहराई में उतरने का मौका मिला और फिर


 दिल ही क्या मैंने तो अपना सबकुछ उसके नाम किया।


जिसने रात को दिन में ढाला दिन को ढलती शाम किया।।


मंदिर मस्जिद में भटकी पर दिल को चैन नहीं आया।


फिर माँ के क़दमों को मैंने अपना चारों धाम किया।।


की भी काफ़ी सराहना हुई। और फिर महफ़िल उरूज पर पहुंच गई


सच कहें तो आदरणीया डाॅ यास्मीन मूमल जी द्वारा पढ़ी गयी धारदार ग़ज़लों से महफ़िल का वातावरण बेहद जीवंत हो गया और बार-बार पेज पर तालियों की बौछार होती रही तथा कैसे डेढ़ घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। मंत्रमुग्ध होकर हम सभी उन्हें जी भर के सुनते रहे, पर दिल है कि भरा नहीं। 


इस तरह कहा जा सकता है कि अपनी धारदार शैली में अपनी बेहतरीन ग़ज़लें सुनाकर डाॅ यास्मीन जी ने सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया, यानी कि महफ़िल लूट ली।


अगर डॉ यास्मीन मूमल जी की उपलब्धियों आदि पर चर्चा करे तो उनकी उपाधियां,उपलब्धियों, प्रकाशन आदि निम्न है


उपाधियां:-


पोस्ट डॉक्ट्रेट. राजनितिक विज्ञान(अखिल भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् दिल्ली) 


पीअच् .डी. हिंदी, बी.एड, 


आई. जी. डी.बोम्बे (ड्राइंग), अदीब,माहिर,कामिल,मोल्लिम,मुंशी(उर्दू)


संस्कृत सम्भाषण कोर्स।


उपलब्धियां


पाँच वर्ष कॉलिज में हिंदी अध्यापन कार्य किया। 


समाज सेवक के तौर पर पौंढ़ शिक्षा कार्यक्रम में किठौर (मेरठ) क्षेत्र की वार्ड प्रभारी के रूप में कार्य किया। 


संस्कृत सम्भाषण निःशुल्क बाल केंद्र चलाये।


जाति,धर्म की नफ़रतें मिटाकर प्रेम भाईचारा फैलाने के लिये भारतीय समता समाज पार्टी में रहकर विशेष कार्य कर रही हैं।


राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न प्रतिष्ठित मंचो से काव्य पाठ।


राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय पत्र,पत्रिकाओं में 300 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित।


राष्ट्रीय ,अंतराष्ट्रीय संगोष्ठियों में 70 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुतिकरण , प्रकाशन।


विधाएँ


लेख ,समीक्षा,शोधपत्र , दोहा, चौपाई, क़ता, क्षणिका, हाइकु, ग़ज़ल , गीत, मुक्त-छंद, तुकांत। 


प्राप्त सम्मान--


अगर डॉ यास्मीन मूमल जी को प्राप्त सम्मान की बात करे तो तो वे सैकड़ों संस्थानों द्वारा सम्मानित की गई है और उज़्बेकिस्तान, नेपाल सहित कई देशों में अपनी शायरी के परचम फहराया है,


प्रकाशित पुस्तक- 


1-जुगलबन्दी काव्य पुस्तक


2-जीवन के सुर काव्य संग्रह


3- महक अभी बाक़ी है काव्य संग्रह


4- सम्वेदना के स्वर काव्य संग्रह


5--भारत नेपाल काव्य सेतू' काव्य संग्रह 'साँझा'


6--भावों के मोती'काव्य संग्रह 'साँझा'


शीघ्र प्रकाश्य- कशिश ग़ज़ल संग्रह


 शायरा डाॅ यास्मीन के फ़ेसबुक लाइव देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें 


https://www.facebook.com/groups/1108654495985480/permalink/1545532545631004/


   लाइव@ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के नाम से चर्चित फेसबुक के इस लाइव कार्यक्रम की विशेषता यह है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले से ही, शाम 4 बजे से ही दर्शक-श्रोता पेज पर जुटने लगते हैं और कार्यक्रम की समाप्ति तक मौज़ूद रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ, महफ़िल की 35 वीं कड़ी के रूप में डाॅ यास्मीन जी जब तक अपनी गजलें सुनातीं रही, रसिक दर्शक और श्रोतागण महफ़िल में जमे रहे।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत) द्वारा आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" के इस कार्यक्रम का समापन टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ओर से डाॅ अमर पंकज जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


कार्यक्रम के संयोजक और ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के एडमिन डाॅ अमर पंकज ने लाइव प्रस्तुति करने वाले शायरा डाॅ यास्मीन मूमल जी के साथ-साथ दर्शकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करते हुए सबों से अनुरोध किया कि महफ़िल के हर कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़कर टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का उत्साहवर्धन करते रहें।


डाॅ अमर पंकज ने टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के सभी साथियों, डाॅ दिव्या जैन जी,आज की शायरा डॉ यास्मीन मूमल जी श्रीमती रेणु त्रिवेदी मिश्रा जी, श्री अनिल कुमार शर्मा 'चिंतित' जी, श्री पंकज त्यागी 'असीम' जी और डाॅ पंकज कुमार सोनी जी के प्रति भी अपना आभार प्रकट करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन-श्रृंखला की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित की।