काश हर घर में आँगन और ताजी हवा को खिड़कियां होती -- कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु


 यूं तो अंधेरों और उजालों से हमारी दोस्ती बहुत गहरी है ! 

मगर मेरे आँगन में सूरज का उजाला पहुंचता है देर से !!

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तुम्हारे आँगन के कोने कोने में फूलों की महक शामिल है !

दुआ करो ख़ुदा से हर एक आँगन में फूलों की बहारें हों !! 

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तुम अपने घर की खूबसूरती को जरा गौर से देखो तो सही ! 

आँगन में किलकारी करते बच्चे की मुस्कान कितनी प्यारी है !! 

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यूं तो ज़िंदगी सिमटती जा रही है शहर के बंद कमरों में ! 

काश हर घर में आँगन और ताजी हवा को खिड़कियां होती !! 

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यूं तो हमने घर के आँगन को सजा रखा है रंगोली और फूलों से ! 

मगर वह बात कहाँ जो तुम्हारे आने से से घर के आँगन में होती है !! 

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यह मत पूछो मुझसे कितना धनवान है मेरे घर का आँगन ! 

घर के आँगन में मां - बाप , बीवी , बच्चों के साथ अपनी खुशियां हैं !! 

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मैं सयाना हो गया हूं तो आँगन की तस्वीर बदल गई ! 

मेरे बचपन के आँगन में हर शाम चंदा मामा आते थे !! 

******************तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !

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