इंसानियत का तक़ाज़ा है तेरी आंख में आंसू हों -- कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु

तुम्हारे शहर की हर एक हवेली पर एतराज़ है मुझको ! 


पड़ोस की झोपड़ी वाला हर शाम भूखा सो जाता है जो !! 


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हाथरस के उन ज़ालिमों को कानून की सजा मिले ऐसी ! 


हर देखने सुनने वाले ऐसे ज़ालिमों की रूह कांप जाए !! 


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हाथरस की निर्भया जैसी वीभत्स घटना पर तुम्हारा मौन अच्छा नहीं ! 


हाथरस जैसे राक्षस घूम रहे हैं मुल्क में जहां-तहां सोचो आख़िर बचोगे कैसे !! 


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हर जगह सियासत की बातें नहीं सुहाती प्यारे ! 


इंसानियत का तक़ाज़ा है तेरी आंख में आंसू हों !! 


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अपनी शर्मनाक करतूतों से किसी कन्या का अस्तित्व मिटा चैन पाओगे कैसे ! 


उस अबला की आह तुम्हें हर क्षण तड़पा तुम्हारे जुल्म का हिसाब लेगी !! 


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हाथरस का निर्भया कांड देखने और सुनने के बाद तुम्हें मर्द कहना सरासर झूठ होगा ! 


हर ऐसे मर्दों को चिन्हित कर ज़मींदोज़ कर देना अब जहां वालों का फ़र्ज़ बनता है !! 


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जुल्म और हवस की शिकार मनीषा की जलती लाश और खाकी के चेहरे पर मुस्कान ! 


मुझे समझ में नहीं आ रहा एक रक्षक की भूमिका इतनी घृणित और शर्मनाक कैसे !! 


************** तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !