कभी-कभी दूसरों का भी दर्द समझा करो तुम -- कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु

शहर - ए - वफ़ा का ज़िक्र मत करो मुझसे ! 


शहर की हर एक रिवायत से वाक़िफ़ हूं !! 


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अब तो बहुत थक गया हूं मैं दिन भर घूमते घूमते ! 


क्या कुछ दिनों तक मुझको सुकून मिलेगा तुमसे !! 


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मैं तुम्हारे नाम का ज़िक्र करते फिर रहा हूं सारे शहर में ! 


लोग खूबियां पूछ रहे हैं मुझसे क्या-क्या बताऊं उनको !! 


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इस जीवन में हमें क्या हासिल हो पाएगा कुछ ठीक नहीं !


ज़माने की हवा इन दिनों कुछ अजीबोगरीब सी लगती है !! 


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अपने दिल का हाल तुम्हें भला कैसे बताऊं मैं ! 


कभी-कभी दूसरों का भी दर्द समझा करो तुम !! 


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तुम्हारे शहर की हर एक लड़की बड़े से प्यार से देखती है मुझको ! 


राखी के त्योहार में कलाई पर राखी बंधवा भाई बन गया सबका !! 


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कदम दो कदम चल कर इधर-उधर देखने की आदत अच्छी नहीं ! 


नवाबों के खूबसूरत शहर में यह आदत तुम्हारी जान ले लेगी!! 


************* तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश !


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