ग़ज़लों की महफ़िल की बाइसवी कड़ी में दिल्ली विश्वविद्यालय की शास्त्रीय संगीत एवं ग़ज़ल गायकी में प्रख्यात गायिका डाॅ अणिमा झा ने दी शानदार प्रस्तुति, डेढ़ घंटे तक चला कार्यक्रम, जमे रहे श्रोता


साहित्य:: वर्तमान कोरोना काल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काफी विसंगति आ चुकी है, ऐसा लगता है कि ज़िंदगी ठहर सी गयी है! साहित्य का क्षेत्र भी इसके दुष्प्रभावों से अछूता नहीं बचा है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों द्वारा वर्ष भर चलाये जाने वाले कवि सम्मेलनों, मुशायरों, सम्मान समारोहों समेत हर प्रकार के आयोजनों पर रोक लग गयी है। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की अदम्य जीजिविषा उसे हर परिस्थिति का अनुकूलन करने में सक्षम बना देती है, सो हम सबने इस भीषण अवसाद की घड़ी में भी ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने के लिये नये-नये रास्तों की तलाश कर ली है। ज़िंदगी की इसी खोज़ का परिणाम है कि नवीन संचार माध्यमों का सहारा लेकर हम अपने-अपने घरों में क़ैद होते हुये भी वेबीनार या साहित्य-समारोहों का आयोजन कर रहे हैं। इसीलिए हम देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से साहित्यिक-साँस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के निमित्त फेसबुक लाइव एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। फेसबुक लाइव के माध्यम से हम अपने पसंदीदा कवियों-शायरों से रूबरू होकर उनकी रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।


इसी क्रम में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में लगी हुई ऐतिहासिक संस्था "पंकज-गोष्ठी" भी निरंतर क्रियाशील है। "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के तत्वावधान में चलने वाली प्रख्यात साहित्यिक संस्था "गजलों की महफ़िल (दिल्ली)" भी लगातार आॅनलाइन मुशायरों एवं लाइव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के अध्यक्ष डाॅ विश्वनाथ झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि "न्यास" की ओर से हम भारत के विभिन्न शहरों में साहित्यिक और साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। 


डाॅ झा ने जानकारी देते हुए ये भक बताया कि  "ग़ज़लों की महफिल (दिल्ली)" की ओर से आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" में शायरों के अलावा ग़ज़ल गायकों को भी सप्ताह में एक दिन आमंत्रित करने के लिये गये निर्णय को सफलतापूर्वक लागू किया जा रहा है ताकि पटल के शायरों की ग़ज़लों को भी स्वर बद्ध करके ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुँचाया जा सके, साथ ही साथ नामचीन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों को भी सुना जा सके।


ग़ज़ल गायकी के इस कार्यक्रम की शुरुआत 15 अगस्त 2020 से करते हुए यह प्रख्यात संस्था, "ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)", अपने लाइव कार्यक्रम श्रृंखला के दूसरे चरण में प्रवेश कर गयी थी। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस लाइव कार्यक्रम श्रृंखला का तीसरा चरण आज, 13 सितंबर 2020, रविवार, से शुरु हुआ जब दिल्ली विश्वविद्यालय की चर्चित और सिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायिका डाॅ अणिमा झा ने ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ग़ज़ल-गायकी के कारवाँ को आगे बढ़ाते हुए लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की 22 वीं प्रस्तुति दी और ग़ज़ल-गायकी की चौथी कड़ी के रूप मे ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के पटल पर लाइव आईं ।


डाॅ अणिमा झा जैसी प्रख्यात गायिका के लाइव आने से मानो महफ़िल का समा ही बदल गया। अतः निःसंदेह कहा जा सकता है कि महफ़िल की आज की शाम को आदरणीया डाॅ अणिमा झा साहिबा ने बुलंदी पर पहुँचा दिया।


तकनीकी करणों से डाॅ अणिमा झा 4 बजे तो लाइव नहीं आ सकीं, लेकिन ठीक 4:10 बजे डाॅ अणिमा झा पटल पर उपस्थित हो गईं और तबसे लगभग देढ़ घंटे तक अपनी खनक भरी दर्दिली आवाज़ में एक से बढ़कर एक ग़ज़लों को सुनाकर उन्होंने दर्शकों- श्रोताओं का दिल जीत लिया।



कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने मंगलाचरण के रूप में गुरु वंदना से की। उसके बाद जब उन्होंने कैफ़ी आज़मी की लिखी और जगजीत सिंह - चित्रा सिंह की गायी इस ग़ज़ल:


मेरे दिल में तू ही तू है दिल की दवा क्या करूँ


दिल भी तू है जाँ भी तू है तुझ पे फिदा क्या करूँ  


को गाते हुए कार्यक्रम का आगाज़ किया तो मानो सबके सब एक अलग ही दुनिया में खो गये। सबके मुँह से वाह-वाह निकलने लगे।


इसके बाद अणिमा जी ने मुजफ्फरपुर अली की लिखी और जगजीत सिंह की ही गायी ये ग़ज़ल जब अपनी खनकती हुई आवाज़ में गायी:


मेरी तस्वीर में रंगा किसी और का तो नहीं 


तो मानो महफ़िल में मौज़ूद दर्शकों-श्रोताओं पर जादू का सा असर होने लगा। 


उसके बाद फिर अणिमा जी ने जनाब सईद राही की लिखी और भूपिंदर सिंह-मिताली सिंह द्वारा गायी हुई ग़ज़ल अपनी खनकती हुई आवाज़ में सुनाई:


शम्मा जलाए रखना हये जब तक कि मैं न आऊँ


खुद को बचाए रखना हये जब तक कि मैं न आऊँ


तो मानो सभी इनकी गायकी में डूब गये। 


उसके बाद डाॅ अणिमा झा ने शहरयार की ग़ज़ल जिसे तलत अजीज़ ने गाया था, का बेहतरीन गायन किया:


ज़िदंगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें


ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें।


इसको सुनकर तो मानो सभी कोई डाॅ अणिमा झा की गायकी के कायल हो गए, इनकी गायी ग़ज़लों को सुनकर महफ़िल में शामिल सभी दर्शक-श्रोता दिल थामकर बैठ गये। कार्यक्रम आगे बढता गया और लोग झूमते रहे।


फिर बारी आयी ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) से जुड़े हुए लखनऊ के मशहूर उस्ताद शायर ओमप्रकाश नदीम साहेब के ग़ज़ल की। अणिमा जी ने जब उनकी ग़ज़ल:


तेरे बगैर ज़िंदगी मुश्किल है मेरी जान


कैसे कहूँ कि तू मेरा कातिल है मेरी जान


गायी तो उपस्थित सभी उस्ताद शायर वाह वाह करने लगे। महफ़िल का वातावरण पूरी तरह से गीतमय हो गया।


इसी क्रम में डाॅ अणिमा झा ने जब महफ़िल से जुड़े हुए दूसरे मशहूर उस्ताद शायर, कोटा के श्री शरद तैलंग साहेब की इस ग़ज़ल को तन्मयता के साथ गाया:


फना जब भी हमारे राज़ होंगे


तो जीने के अलग अंदाज़ होंगे


 तो स्वयं शरद तैलंग साहेब समेत सभी दर्शक श्रोता वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह करने लगे।


ग़ज़ल-गायकी के इस ऐतिहासिक कार्यक्रम का समापन डाॅ अणिमा झा साहिबा ने ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के संचालक व एडमिन तथा समकालीन चर्चित ग़ज़लगो डाॅ अमर पंकज की इस ग़ज़ल से की बेहतरीन प्रस्तुति से किया:


आपसे मिलने की ख़ातिर आह हम भरते रहे


क्या हुआ जो ख़्वाब में ही प्यार हम करते रहे।


डाॅ अमर पंकज जी की इस ग़ज़ल को अपने अद्भुत अंदाज़ में, अपनी गायकी में डूबकर जब अणिमा जी ने गाया तो उपस्थित दर्शक-श्रोता भी मानो उनकी अद्भुत गायकी में डूब से गये। वाह वाह की झड़ी लग गयी और कैसे देढ़ घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला।


मंत्रमुग्ध होकर हम सभी अणिमा जी को सुनते रहे, पर दिल है कि भरा नहीं।


डाॅ अणिमा झा की गायकी की एक ख़ास खूबी ये रही कि बिना तबले की संगत के भी सिर्फ़ हारमोनियम के साथ ही ग़ज़लें गाकर उन्होंने न सिर्फ़ सबको बाँधे रखा बल्कि अपनी ख़नक और दर्द भरी आवाज़ से सबका दिल जीत लिया। ओमप्रकाश नदीम, शरद तैलंग और डाॅ अमर पंकज की ग़ज़लों को अपनी बेहतरीन धुन देकर जब इन्होंने गाया तो मानो ग़ज़ल का कथ्य मूर्त रूप लेकर सबकी आँखों में तैरने लगा। ये डाॅ अणिमा झा की गायकी का कमाल था।


इस तरह कहा जा सकता है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की चर्चित और सधी हुई गायिका डाॅ अणिमा झा ने आज के लाइव@ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया। वास्तव में इन्होंने श्रोताओं का दिल जीत लिया, यानी कि महफ़िल लूट ली।


डाॅ अणिमा झा के इस कार्यक्रम को फ़ेसबुक पर लाइव देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें 


https://www.facebook.com/groups/1108654495985480/permalink/1497126353804957/


   लाइव@ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के नाम से चर्चित फेसबुक के इस लाइव कार्यक्रम की विशेषता यह है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले से ही, शाम 4 बजे से ही श्रोता पेज पर जुटने लगते हैं और कार्यक्रम की समाप्ति तक मौज़ूद रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ, महफ़िल की 22 वीं कड़ी के रूप में डाॅ अणिमा झा साहिबा जब तक ग़ज़लें सुनाती रहीं, रसिक दर्शक और श्रोतेगण महफ़िल में भाव विभोर होकर डूबे रहे।



पंकज गोष्ठी न्यास द्वारा आयोजित लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के इस कार्यक्रम का समापन टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ओर से डाॅ अमर पंकज जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


कार्यक्रम के संयोजक और ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के एडमिन डाॅ अमर पंकज ने लाइव प्रस्तुति करने वाली गायिका आदरणीया डाॅ अणिमा झा के साथ साथ दर्शकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट किया और सबों से अनुरोध किया कि महफ़िल के हर कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़कर टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का उत्साहवर्धन करते रहें।


डाॅ अमर पंकज ने टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के सभी साथियों, डाॅ दिव्या जैन जी , डाॅ यास्मीन मूमल जी, श्रीमती रेणु त्रिवेदी मिश्रा जी, श्री अनिल कुमार शर्मा 'चिंतित' जी, श्री पंकज त्यागी 'असीम' जी और डाॅ पंकज कुमार सोनी जी के प्रति भी अपना आभार प्रकट करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन-श्रृंखला की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित की।


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