थोड़ी हया भी ज़रूरी है हुस्न की हिफ़ाज़त को -- कवि तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु


शर्म की बातें कहाँ से आ गई तुम्हारे जीवन में ! 


शर्म तो तुम्हारी प्रगति के सारे रास्ते रोक देगी !! 


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हया को तुम औरत का एक हथियार समझो !! 


थोड़ी हया भी ज़रूरी है हुस्न की हिफ़ाज़त को !! 


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यूं तो कुदरती तौर पर हुस्न की मलिका हो तुम ! 


पास थोड़ी हया होती तो मामला कुछ और होता !! 


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हुस्न को बहकने में देर तो लगती ही नहीं ! 


यह हया है जो हुस्न को संभाल के रखती है !! 


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शर्म हमारी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है !


भारतीय संस्कृति में शर्म को भी गहना समझो !! 


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उनसे मुलाकात का हर मौका गंवा दिया हमने ! 


काश यह शर्म नाम की बीमारी हमसे दूर होती !! 


**************तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु कवि व मंच संचालक अंबेडकरनगर उत्तर प्रदेश!


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