मौत के बाद भी नही जाग रहा मेडिकल कॉलेज प्रशासन, 18 वेंटिलेटर शो पीस बने,वेंटिलेटर पर जाने से हो जाती है मौत-प्राचार्य


मुख्यमंत्री का आदेश भी बेअसर,आदेश के बाद भी 210 बेडो पर ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं


बस्ती 06अगस्त । आखिर में कोरोना संक्रमित मरीजों को वेंटिलेटर की सुविधा क्यो नही दी जा रही है ? वेंटिलेटर मांगने और उसको इंस्टाल करने की मेहनत ,दावे के बावजूद असलियत यही है। आश्चर्यजनक और दुःखद है कि बस्ती के महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज में कोरोना काल में करीब पांच महीने के दौरान आठ संक्रमितों की मौत हो चुकी है। इनमें से पांच को सांस फूलने की शिकायत थी लेकिन मेडिकल कॉलेज में 18 वेंटिलेटर होने के बावजूद एक भी मरीज को इसकी सुविधा नहीं मिली। 


             इस पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन का मासूम से क्रूरता की हद का तर्क भी जान लीजिए। उसका मानना है कि वेंटिलेटर पर जाने वाले अधिकतर मरीजों की मौत हो जाती है। इस कारण उन्हें वेंटिलेटर पर नहीं रखा गया। ऑक्सीजन आदि लगाकर इलाज किया जा रहा है।


              मेडिकल कॉलेज बस्ती में 18 वेंटिलेटर शासन तथा मुख्य विकास अधिकारी सरनजीत ब्रोंका के निजी प्रयास से उपलब्ध कराए गए हैं। वार्ड पूरी तरह से तैयार है। मशीनें इंस्टाल हैं और पूरी तरह से इस्तेमाल के लिए तैयार हैं। शासन से नामित तीन-तीन नोडल अधिकारी आए और वार्ड देखकर चले गए। हर किसी ने एक ही सवाल किया कि यहां कितने मरीजों का इलाज हुआ?जवाब शून्य मिला। इलाज क्यों नहीं होता? इस सवाल पर जिम्मेदार या तो चुप्पी साध गए या जवाब दिया कि किसी मरीज को जरूरत ही नहीं पड़ी।


  हियुवा पदाधिकारी की बहन को सांस फूलने पर रेफर किया, रास्ते में उनकी मौत हो गयी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उन्हें समय से वेंटिलेटर मिला होता तो स्थिति नियंत्रित की जा सकती थी। ऑक्सीजन से काम चलाने का प्रयास वेंटिलेटर जैसी सुविधा होने पर शहर के वरिष्ठ डॉक्टर्स को आश्चर्यजनक लगता है।बस्ती मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान आठ कोरोना संक्रमितों की मौत हो चुकी है। इनमें बानपुर लालगंज बस्ती का युवक, भवानीगंज सिद्धार्थनगर की महिला, अमदेवा महुली संतकबीरनगर के अधेड़, जगदीशपुर वाल्टरगंज बस्ती की महिला शामिल है। बोदवल मुंडेरवा के कोरोना पॉजिटिव अधेड़ की सांस फूलने की शिकायत पर मौत हुई तो परिजन उस दिन शव तक लेने नहीं आए। परिजनों की मानें तो पांडेय बाजार के व्यापारी और हरेवा सोनहा के अधेड़ को सांस फूलने की शिकायत पर ही मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। हर्रैया के कृष्णौता निवासी एक व्यक्ति को भी इसी तरह की शिकायत हुई। इन सभी की मौत सांस फूलने के चलते हुई, लेकिन किसी को भी वेंटिलेटर पर नहीं ले जाया गया। अस्पताल प्रबंधन ने केवल ऑक्सीजन से काम चलाने का प्रयास किया।


   सूत्रों की माने तो मेडिकल कॉलेज में तैनात चार एनेस्थेटिक में से तीन कोविड प्रोटोकॉल के हिसाब से ओवरएज अर्थात 60 साल की उम्र पार कर चुके हैं। इन्हें कोरोना ड्यूटी में नियमत: नहीं लगाया जा सकता है। वेंटिलेटर चलाने के लिए चौबीसों घंटे एनेस्थेटिक की जरूरत होती है। इस संबंध में प्राचार्य का कहना है कि प्रशिक्षण लेकर कोई भी चिकित्सक वेंटिलेटर चला सकता है। इसमें बड़ी समस्या नहीं है, इसके बावजूद वेंटिलेटर कोरोना आपदा काल मे शो पीस बन कर रह गए है।अस्पतालों को अधिक से अधिक वेंटिलेटर देकर गंभीर मरीजों को इलाज की सुविधा देने पर शासन-प्रशासन का जोर है। बस्ती में भी शासन,प्रशासन और सीडीओ की मदद से 18 वेंटिलेटर की व्यवस्था हुई।उनके इंस्टालेशन के समय भी प्रधानाचार्य मेडिकल कालेज द्वारा शासन की गाइड लाइन की गलत व्यख्या की आड़ में रोकने का प्रयास किया गया था। जिलाधिकारी आशुतोष निरंजन ने कड़ी फटकार लगाते हुए इंस्टालेशन पूर्ण कराया था। ऐसे में 18 वेंटिलेटर होने के बाद भी बस्ती मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर पर जाने वाले अधिकांश मरीज मार जाते है का कुतर्क देकर उनका प्रयोग नहीं किया जा रहा है,जबकि सभी वेंटिलेटर चालू हालत में हैं। जिन मरीजों की मेडिकल कॉलेज में मौत हुई है, उन्हें वेंटिलेटर तक ले जाने का अवसर ही नहीं मिला। वेंटिलेटर के अलावा मरीज के लिए ऑक्सीजन की सुविधा है।


महेंद्र तिवारी 


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