ग़ज़लों की महफ़िल की चौदहवी कड़ी में पूर्व आयकर आयुक्त झारखण्ड निवासी डाॅ विनोद सिन्हा ने शायरी के विविध रंगों से लाइव महफ़िल में बाँधा खूबसूरत समा,मन्त्रमुग्ध होकर घंटों सुनते रहे श्रोता


साहित्य:: वर्तमान कोरोना काल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काफी विसंगति आ चुकी है, ऐसा लगता है कि ज़िंदगी ठहर सी गयी है! साहित्य का क्षेत्र भी इसके दुष्प्रभावों से अछूता नहीं बचा है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों द्वारा वर्ष भर चलाये जाने वाले कवि सम्मेलनों, मुशायरों, सम्मान समारोहों समेत हर प्रकार के आयोजनों पर रोक लग गयी है। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की अदम्य जीजिविषा उसे हर परिस्थिति का अनुकूलन करने में सक्षम बना देती है, सो हम सबने इस भीषण अवसाद की घड़ी में भी ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने के लिये नये-नये रास्तों की तलाश कर ली है। ज़िंदगी की इसी खोज़ का परिणाम है कि नवीन संचार माध्यमों का सहारा लेकर हम अपने-अपने घरों में क़ैद होते हुये भी वेबीनार या साहित्य-समारोहों का आयोजन कर रहे हैं। इसीलिए हम देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से साहित्यिक-साँस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के निमित्त फेसबुक लाइव एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। फेसबुक लाइव के माध्यम से हम अपने पसंदीदा कवियों-शायरों से रूबरू होकर उनकी रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।


इसी क्रम में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में लगी हुई ऐतिहासिक संस्था "पंकज-गोष्ठी" भी निरंतर क्रियाशील है। "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के तत्वावधान में चलने वाली प्रख्यात साहित्यिक संस्था "गजलों की महफ़िल (दिल्ली)" भी लगातार ऑन लाइन मुशायरों एवं लाइव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के अध्यक्ष डाॅ विश्वनाथ झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि "न्यास" की ओर से हम भारत के विभिन्न शहरों में साहित्यिक और साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इसी क्रम में "ग़ज़लों की महफिल (दिल्ली)" की ओर से आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" में शायरों के अलावा ग़ज़ल गायकों को भी सप्ताह में एक दिन आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया, ताकि पटल के शायरों की ग़ज़लों को स्वर बद्ध कर करके ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुँचाया जा सके, साथ ही साथ नामचीन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों को भी सुना सके। 


अतः 15 अगस्त 2020 से यह प्रख्यात संस्था "ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)", अपने लाइव कार्यक्रम श्रृंखला के दूसरे चरण में प्रवेश कर गयी है। इस दूसरे चरण के कार्यक्रम के रूप में 25 अगस्त 2020, मंगलवार की शाम 4 बजे से महफ़िल की 14 वीं लाइव प्रस्तुति में अपनी बेहतरीन ग़ज़लें पढ़कर सुकंठ शायर, वरिष्ठ आई आर एस अधिकारी (सेवानिवृत) डाॅ बिनोद सिन्हा जी ने सबका दिल जीत लिया।



ठीक 4 बजे आदरणीय बिनोद जी पटल पर उपस्थित हो गए और तबसे लगभग सवा घंटे तक वे एक से बढ़कर एक बेहतरीन ग़ज़लें तरन्नुम में सुनाते रहे।


जब उन्होंने अपनी ग़ज़ल:


हाँ दुआएँ कभी नहीं मरतीं


जैसे माएँ कभी नहीं मरतीं


 


डोर सांसों की टूट भी जाए


ये हवाएं कभी नहीं मरतीं


 


लौ मुहब्बत की बुझ न पाएगी


यूँ वफ़ाएँ कभी नहीं मरतीं


सुनायी तो सबके मुँह से वाह वाह निकलने लगे।


फिर बिनोद जी की इस ग़ज़ल:


जुगाड़ जीत ही जाता है हर ज़माने में


जहाँ ज़रूरी हो क़िस्मत वहीं नहीं होती


ने भी खूब तालियाँ बटोरीं।


बिनोद जी की इस ग़ज़ल:


ज़्यादा सोच समझ कर जीना नासमझी नादानी है


रस्ता- रस्ता चलकर देखो हर मंज़िल आ जानी है. 


धीरे -धीरे आ लगनी है नाव किनारे लहरों के


कतरा -कतरा बहकर देखो सारी दुनिया पानी है. 


पर तो लोग फिदा हो गये।


बिनोद जी की इस ग़ज़ल:


दिल से लगाके जिनको सीने में आब आये


क्यूँ कर पड़ा जलाना इन बेटियों को इक दिन. 


क़ुदरत समेट लेगी सब पाक़ नेमतें जब


तरसेगा तब ज़माना इन बेटियों को इक दिन. 


से तो सबकी आँखे छलक आईं।


मौज़ूदा दौर के मद्देनज़र बिनोद जी की इस खूबसूरत ग़ज़ल:


दिल भी मिल जाएंगे तुम हाथ मिलाओ तो सही


साथ चलने की उम्मीदों को जगाओ तो सही. 


उनकी आँखों की सियाही में ग़ज़ल हँसती है


वैसी शिद्दत से नज़र उनसे मिलाओ तो सही. 


की भी काफ़ी सराहना हुई।


बिनोद जी की मौज़ूदा व्यवस्था पर तंज़ सकती इस ग़ज़ल:


तरक़्क़ी के बहाने से यूँ मीनारें खड़ी कर लीं 


पुलों का नाम ले लेकर यूँ दीवारें बड़ी कर लीं. 


ये कैसे नाख़ुदा हैं हाय ये कैसे मुहाफ़िज़ हैं?


सफीने छोटे कर डाले यूँ पतवारें बड़ी कर लीं. 


को भी श्रोताओं द्वारा ख़ूब पसंद किया किया।


भारत-पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक साझीदारी लेकिन राजनैतिक और सैनिक टकराहट के बीच फँसी आम जनता की बेबसी का चित्रण करती अपनी इस ग़ज़ल:


तन्हा इन्सान है इस पार भी उस पार भी अब


दिल में तूफ़ान है इस पार भी उस पार भी अब. 


जिनके बेटे नहीं लौटे कभी सरहद से ही


माएँ हलकान हैं इस पार भी उस पार भी अब. 


पर भी बिनोद सिन्हा जी ने ख़ूब दाद ली।


सच कहें तो आदरणीय डाॅ बिनोद सिन्हा जी द्वारा तरन्नुम में पढ़ी गयी सुकोमल ग़ज़लों से महफ़िल का वातावरण बेहद रसमय हो गया और बार-बार पेज पर तालियों की बौछार होती रही तथा कैसे सवा घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। मंत्रमुग्ध होकर हम सभी बिनोद जी को सुनते रहे, पर दिल है कि भरा नहीं।


इस तरह कहा जा सकता है कि अपनी मधुर आवाज़ में अपनी ग़ज़लें सुनाकर बिनोद जी ने सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया, यानी कि महफ़िल लूट ली।


डाॅ बिनोद सिन्हा जी के फ़ेसबुक लाइव देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें 


https://www.facebook.com/groups/1108654495985480/permalink/1480428605474732/


   लाइव@ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के नाम से चर्चित फेसबुक के इस लाइव कार्यक्रम की विशेषता यह है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले से ही, शाम 4 बजे से ही दर्शक-श्रोता पेज पर जुटने लगते हैं और कार्यक्रम की समाप्ति तक मौज़ूद रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ, महफ़िल की चौदहवीं कड़ी के रूप में आदरणीय डाॅ बिनोद सिन्हा जी जब तक अपना कलाम सुनाते रहे, रसिक दर्शक और श्रोतागण महफ़िल में जमे रहे।



"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत) द्वारा आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" के इस कार्यक्रम का समापन टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ओर से डाॅ अमर पंकज जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


कार्यक्रम के संयोजक और ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के एडमिन डाॅ अमर पंकज ने लाइव प्रस्तुति करने वाले शायर आदरणीय डाॅ बिनोद सिन्हा जी के साथ-साथ दर्शकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करते हुए सबों से अनुरोध किया कि महफ़िल के हर कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़कर टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का उत्साहवर्धन करते रहें।


डाॅ अमर पंकज ने टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के सभी साथियों, डाॅ दिव्या जैन जी , डाॅ यास्मीन मूमल जी, श्रीमती रेणु त्रिवेदी मिश्रा जी, श्री अनिल कुमार शर्मा 'चिंतित' जी, श्री पंकज त्यागी 'असीम' जी और डाॅ पंकज कुमार सोनी जी के प्रति भी अपना आभार प्रकट करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन-श्रृंखला की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित की।


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