योगी राज में सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक जंगलराज कैसे आ गया? संध्या दीक्षित की कलम से


 उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कानून व्यवस्था के मोर्चे क्या पर पूरी तरह से नाकारा साबित हो रही है? क्या प्रदेश पुनः ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रहा है। वो ही जंगलराज जिसके चलते 2007 के विधान सभा चुनाव में मुलायम सिंह और उसके दस वर्षों के बाद 2017 के चुनाव में उनके पुत्र अखिलेश यादव को प्रदेश में व्याप्त जंगलराज के चलते सत्ता से बेदखल होना पड़ गया था। 2007 और 2017 के विधान सभा चुनाव के समय प्रदेश का जंगलराज बड़ा सियासी मुद्दा बना था। 2007 के विधान सभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार को इसी एक मोर्चे पर जबर्दस्त पटकनी दी थी। उस समय हर बसपाई की जुबान पर एक ही नारा हुआ करता था, 'चढ़ गुंडों की छाती पर, मोहर लगाओ हाथी पर।’ 2007 में बसपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री मायावती ने कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के ऐसे पेंच कसे कि गुंडे-बदमाशों के पसीने छूट गए। कानून व्यवस्था के मामले में चंद महीनों में ही फर्क नजर आने लगा। किसी गड़बड़ी या घटना पर मायावती जब संबंधित अधिकारी से सफाई मांगती थीं तो नौकरशाह से लेकर पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी तक थरथर कांपने लगते थे। मायावती के कार्यकाल में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था, लेकिन किसी तरह का बवाल तो दूर पूरे प्रदेश में कहीं पत्ता तक नहीं खड़का था।


2007 के विधान सभा चुनाव में मुलायम के नेृतत्व वाली समाजवादी सरकार के जंगलराज को बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने पक्ष में भुनाया था तो 2017 के विधान सभा चुनाव में यही करिश्मा भारतीय जनता पार्टी ने किया। चुनावी समर में बीजेपी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की टीम ने जंगलराज के मसले पर अखिलेश सरकार को ऐसा घेरा कि उनकी सरकार का भी वही हश्र देखने को मिला तो पिता मुलायम सिंह की सरकार का हुआ था। बस फर्क इतना है कि 2007 में जंगलराज के मसले पर मुलायम को पटकनी देने वाली मायावती ने अपने पांच वर्षों के शासनकाल में कभी कानून व्यवस्था नहीं बिगड़ने दी, जबकि योगी सरकार पिछले कुछ समय से कानून व्यवस्था के मसले पर विपक्ष के निशाने पर है। विपक्ष यह साबित करने में लगा है कि योगी कानून व्यवस्था संभाल नहीं पा रहे हैं। प्रदेश में जंगलराज व्याप्त है।


यह सब तब हो रहा है जबकि मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद योगी आदित्यनाथ ने सबसे अधिक जोर इसी बात पर दिया था कि प्रदेश की कानून व्यवस्था चाक-चौबंद रहे। इसके लिए योगी भरपूर मेहनत भी कर रहे हैं। योगी जानते थे कि अखिलेश सरकार में व्याप्त ‘जंगलराज’ से त्रस्त होकर ही प्रदेश की जनता ने भाजपा को बहुमत दिया था। भाजपा को 2017 के विधान सभा चुनाव में विजय मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और तब के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष और अब गृह मंत्री अमित शाह ने कौन होगा यूपी का मुख्यमंत्री, जब इसका फैसला किया था तो दोनों दिग्गज नेताओं ने मुख्यमंत्री की कुर्सी के तमाम दावेदारों को दरकिनार करके योगी आदित्यनाथ को इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया था, क्योंकि योगी की पहचान कड़क छवि वाले नेता के रूप में हुआ करती थी, यही पहचान उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आई थी, लेकिन लगता है कि कड़क छवि से ही सब कुछ नहीं होता है। किसी सूबे की बागडोर संभालने के लिए मुख्यमंत्री का कड़क होना जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है उसके पास प्रशासनिक क्षमता का अनुभव होना।


योगी ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए अपनी छवि के अनुरूप ही फैसले लिए। गुंडे बदमाशों को चुन-चुन के मारा गया। कई बदमाश प्रदेश छोड़कर भाग गए तो अनेकों अपनी जमानत रद्द करा कर जेल चले गए। इतना ही नहीं लड़कियों और महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों पर भी शिकंजा कसा गया। योगी की सख्ती का असर भी दिखा, लेकिन पिछले करीब आठ-दस महीनों से प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ती ही जा रही है। बीते दिसंबर में नागरिकता संशोधन बिल (सीएए) के विरोध के चलते प्रदेश की कानून व्यवस्था पर ग्रहण लगा था जो अब तक हटने का नाम नहीं ले रहा है। प्रदेश में अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। हालात जल्दी नहीं सुधरे तो करीब पौने दो वर्ष बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।


खैर, पिछले एक माह में जिस तरह से प्रदेश में हत्याओं की बाढ़-सी आ गई है, उससे योगी सरकार ही नहीं भाजपा आलाकमान भी चिंतित नजर आ रहा है। विपक्ष भी कानून व्यवस्था के मामले में योगी सरकार को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है। सूत्र बताते हैं कि कानपुर के बिकरू कांड के बाद लैब टेक्नीशियन की अपरहण व हत्या तथा गाजियाबाद में पत्रकार की हत्या के मामलों से सीएम योगी आदित्यनाथ बेहद नाराज हैं। सीएम योगी के तमाम प्रयास के बाद भी बेलगाम होता अपराध अब पुलिस के खिलाफ बड़ी कार्रवाई का संकेत दे रहा है। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के मामले में कोई भी समझौता न करने वाले सीएम योगी आदित्यनाथ के तेवर आज सीएम आवास पर कोरोना वायरस की समीक्षा बैठक के दौरान ही देखने को मिल गए। पुलिस तथा अपराधियों के बीच साठ-गांठ के कई मामले सामने आने के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ का पारा चढ़ा है। उनके तेवर देखकर अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रदेश के पुलिस महकमे में बड़ा फेरबदल जल्दी हो सकता है। इसके साथ ही कानपुर, गाजियाबाद, सीतापुर तथा कौशांबी में लापरवाही बरतने के दोषी पुलिस वालों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई भी तय है। कानपुर में उत्तर प्रदेश पुलिस के नाम एक और कलंक लग गया है। यहां से अपहृत लैब टेक्नीशियन की हत्या से सरकार की किरकिरी होने लगी है। यहां पर पुलिस ने अपहृत लैब टेक्नीशियन के घर वालों से अपहरणकर्ता को 30 लाख रुपये भी दिलवा दिए, लेकिन अपहरणकर्ता भाग निकले। कानपुर में विकास दुबे के केस के बाद यह मामला काफी संगीन हो गया है।


लाख टके का सवाल यही है कि यदि 2007 में विधान सभा चुनाव जीतने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के समय के जंगलराज पर लगाम लगाने में कामयाब रहीं थी तो योगी ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। इसका एक ही जवाब है, वह यह कि मायावती को अपने ऊपर भरोसा था, वह गिनती के एक-दो अधिकारियों से ही फीडबैक लिया करती थीं, लेकिन निर्णय स्वयं लिया करती थीं। जबकि योगी उन अधिकारियों के सहारे चल रहे हैं जो स्वयं प्रदेश की कानून व्यवस्था से लेकर तमाम विकास कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं। यह अधिकारी अपनी नाकामी छिपाने के लिए मुख्यमंत्री को भ्रमित करते रहते हैं। इन अधिकारियों को पता है कि जब कोई मुख्यमंत्री या मंत्री अपनी पार्टी के सांसद/विधायकों और नेताओं से मिलता-जुलता नहीं है, तो उसे जमीनी हकीकत का पता ही नहीं चलता है, ऐसे में नौकरशाह, पुलिस एवं तमाम विभागों के अधिकारी मनमानी करते रहते हैं और उनके लिए सीएम को किसी भी मसले पर बरगलना आसान रहता है। योगी के मुट्ठी भर ब्यूरोक्रेट्स पर आश्रित रहने के चलते कई बार भ्रम की स्थिति बनी रहती है। योगी सरकार द्वारा विकास दुबे मुठभेड़ कांड की जांच के लिए बनाई गई स्पेशल इंनवेस्टिंग टीम (एसआईटी) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। विकास मुठभेड़ कांड की जांच के लिए बनी एसआईटी में उस पूर्व आईपीएस अधिकारी रविन्द्र गौड़ को रखने का क्या तुक हो सकता है जिसे एसएसपी रहते हुए बरेली-मथुरा रोड पर हुए एक फर्जी एनकांउटर केस में अदालत से दोषी करार दिया जा चुका हो। ऐसी चूक के लिए कौन जिम्मेदार होता है, इसका राजफाश होना जरूरी है ताकि जनता के बीच में भ्रम न रहे।


अच्छा होगा, यदि योगी ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर होने की बजाए अपनी ही पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की उस बात पर गौर फरमा लेते जिसमें कल्याण सिंह ब्यूरोक्रेसी की तुलना ‘बेलगाम घोड़े’ से करते हुए कहते थे, ‘नौकरशाही उस बेलगाम घोड़े की तरह है, जिस पर सवार घुड़सवार की रानों (जांघों) में यदि दम नहीं है और रास (लगाम) खींचने का हुनर नहीं है तो यह ‘घोड़ा’ उसे पटक देता है। यह बात इसलिए भी प्रमाणित लगती है क्योंकि योगी अपने शुरूआती कार्यकाल में इतना ब्यूरोक्रेसी पर निर्भर नहीं थे, जितना कोराना के बाद हो गए हैं। शुरूआत में उन्होंने लापरवाही करने वाले नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों पर काफी सख्त रवैया अख्तियार कर रखा था। इसी वजह से कोरोना से पूर्व प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति ज्यादा चाक-चौबंद थी। आज स्थिति यह है कि योगी सरकार द्वारा दबाव में ज्यादा फैसले लिए जा रहे हैं। इसी के चलते कई अधिकारी नप जाते हैं तो कई बच जाते हैं।


लब्बोलुआब यह है कि योगी जी प्रदेश की कानून व्यवस्था पटरी पर लाने के लिए जितनी जल्दी टीम-11 की छत्रछाया से बाहर निकल आएंगे, उतना ही उनके और उनकी पार्टी के लिए बेहतर रहेगा। अच्छा होगा सरकार चलाते समय योगी किसी भी दल के नेता या अधिकारी को ‘अछूत’ नहीं समझें। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पार्टी पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे लोगों से विचार-विमर्श कर सकते हैं तो योगी जी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं। उन्हें (योगी जी) भी प्रदेश हित में दलगत राजनीति से उठकर सभी दलों के जिम्मेदार नेताओं से विचार-विमर्श करने में परहेज नहीं करना चाहिए। प्रदेश के मौजूदा हालात में सुधार आए इसके लिए सीएम योगी टीम-11 से हटकर या उसको साथ लेकर भी अपनी पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं, जनप्रतिनिधियों, पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों, अनुभवी पुलिस अधिकारियों, समाज सेवकों, पत्रकारों, अधिवक्ताओं आदि से भी सलाह-मशविरा कर सकते हैं।


ब्यूरोक्रेसी में कई रिटायर्ड या सेवारत नौकरशाह मौजूद हैं जो समय-समय पर अपनी प्रशासनिक क्षमता से प्रदेश को बड़े से बड़े संकट से उबार चुके हैं। योगेन्द्र नारायण, दिवाकर त्रिपाठी, आरके चतुर्वेदी, आरकेएस राठौर, नवनीत सहगल, राज शेखर, एनपी सिंह, अनिल पाठक जैसे तमाम नौकरशाहों के साथ कानून व्यवस्था सुधारने के लिए पूर्व डीजीपी बृजलाल, डीके शर्मा, आईपीएस महेन्द्र मोदी, आईपीएस नवनीत सिकेरा आदि से भी राय जी जा सकती है।


आज स्थिति यह है कि योगी सरकार द्वारा दबाव में ज्यादा फैसले लिए जा रहे हैं। इसी के चलते कई अधिकारी नप जाते हैं तो कई बच जाते हैं। ऐसा ही योगी सरकार द्वारा पिछले दिनों कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र में लैब टैक्नीशियन संजीव यादव का अपहरण और उसके बाद हत्या का मामले में देखने को मिला। खास बात यह थी कि अपहरणकर्ताओं को तीस लाख रूपए की रकम पुलिस ने ही दिलवाई थी, लेकिन पुलिस इस बात से पूरी तरह मुकर गई। इस कांड के लिए पुलिस पर कार्रवाई की बजाए वहां के एसएसपी मामले को दबाते रहे। पुलिस वालों पर कोई भी केस दर्ज नहीं किया गया। काफी किरकिरी के बाद शुक्रवार को एएसपी अपर्णा गुप्ता, क्षेत्राधिकारी मनोज गुप्ता, तत्कालीन एसओ बर्रा रणजीत राय और चौकी इंचार्ज राजेश कुमार को सस्पेंड किया गया।


वैसे, उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल ने भी योगी सरकार को आईना दिखाने का काम किया है। बीजेपी विधायक ने अपनी ही सरकार की पुलिसिंग पर निशाना साधा है। उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर उन्होंने लिखा कि पुलिस हकीकत में निर्दोषों पर कार्रवाई करती है और आपराधिक किस्म के व्यक्तियों से सांठगांठ कर अपराध को बढ़ावा देती है। मिश्र ने टॉप टैन कुख्यात पुलिस वालों की लिस्ट यूपी पुलिस से मांगी है। उन्होंने पत्र लिखकर आईजी रेंज से इन लिस्ट को समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाने की मांग भी की है। वहीं बरेली पुलिस ने जवाब दिया कि ऐसी कार्रवाई प्रचलित है।


-संध्या दीक्षित