पाँच अगस्त को रचा जायेगा नया इतिहास, खत्म होगा 500 वर्षों का वनवास - संध्या दीक्षित की कलम से


आखिरकार वह ऐतिहासिक घड़ी आ ही गई, जिसका एक-दो नहीं, दस-बीस या फिर पचास साल भी नहीं, बल्कि पांच सौ से अधिक वर्षों से राम भक्त इंतजार कर रहे थे। पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अयोध्या में प्रभु राम की जन्मभूमि पर जब राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करेंगे तो उन असंख्य लोगों की आत्मा को भी शांति मिलेगी, जिन्होंने पिछले पांच सौ सालों में राम मंदिर निर्माण का सपना पूरा करने के लिए अपने प्राणों की आहूति दी थी। ऐसे लोगों के लिए राम मंदिर निर्माण होना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बने यह हर हिन्दू चाहता था। राम मंदिर निर्माण के समय केन्द्र में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार का होना भी कम संयोग नहीं है। अगर केन्द्र और राज्य दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकारें नहीं होती तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अभी यह विवाद और लम्बा खिंचता। पिछले पांच सौ वर्षों से राम मंदिर निर्माण में कई तरह की अड़चनें खड़ी की जा रही थीं।


राम मंदिर निर्माण की शुभ घड़ी पर पांच सौ वर्ष पुराने विवाद के इतिहास को कैसे भुलाया जा सकता है, जब वर्ष 1528 में में श्रीराम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी, जबकि हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। बताते चलें कि 1528 में राम मंदिर तोड़ा गया था, इससे दो वर्ष पूर्व 1526 में भारत में मुगलकाल शुरू हुआ था, मुगल वंश का संस्थापक बाबर था, अधिकतर मुगल शासक तुर्क और सुन्नी मुसलमान थे। मुगल शासन 17वीं शताब्दी के आखिर में और 18वीं शताब्दी की शुरुआत तक चला और 19वीं शताब्दी के मध्य में समाप्त हुआ। जब तक देश पर मुगलों का राज रहा तब तक राम भक्तों की आवाज को किसी न किसी तरह से दबा दिया जाता था। इस दौरान काशी से लेकर मथुरा तक तमाम मंदिर तोड़कर वहां मस्जिद बना दी गई थीं।


मुगल काल के कमजोर पड़ने के बाद 1853 में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर पहली बार विवाद हुआ, जो धीरे-धीरे बढ़ता ही गया। इसी बीच देश पर हुकूमत कर रहे अंग्रेजों ने अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को आगे बढ़ाते हुए 1859 में नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और पूजा के लिए हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग करने का दे दिया। 1947 में देश आजाद होने के बाद वर्ष 1949 में कथित तौर पर मंदिर के अन्दर के हिस्से में भगवान श्रीराम की मूर्ति ‘प्रकट’ हो गई। इस पर मुस्लिम पक्ष उग्र हो गया। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया। सन् 1986 में फैजाबाद की एक जिला अदालत ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दे दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की।


इसी के बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण का मसला आमजन से निकल के सियासतदारों के हाथ में चला गया। 1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी जमीन पर राम मंदिर की मुहिम शुरू कर की। 1990 में विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में राम जन्म भूमि निर्माण की घोषणा कर दी। कारसेवा की तारीख 30 अक्टूबर 1990 तय हुई। राम भक्तों को कारसेवा के लिए आमंत्रित किया गया। इस समय तक भारतीय जनता पार्टी भी विश्व हिन्दू परिषद के साथ राम मंदिर निर्माण की मुहिम में जुड़ चुकी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस और प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने घोषणा कर रखी थी कि 30 अक्टूबर को वह कारसेवा नहीं होने देंगे, अयोध्या में ‘परिंदा’ भी पर नहीं मार पाएगा। पूरे प्रदेश को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। अयोध्या की ओर जाने वाली सभी सड़कें बंद कर दी गयीं और सभी रेलगाड़ियां रद्द कर दी गयीं। श्री रामजन्मभूमि को पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने घेर लिया और अयोध्या को छावनी में बदल दिया गया था। इतनी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था के बाद दुनिया भर से आये पत्रकारों को भी यह विश्वास हो गया था कि कारसेवा असंभव है। 29 अक्तूबर को अज्ञात स्थान से जब श्री अशोक सिंहल का बयान जारी हुअ कि पूर्व घोषणा के अनुसार 30 अक्तूबर को ठीक 12.30 बजे कारसेवा होगी, तो सहसा कोई भी इस पर विश्वास न कर सका। 30 अक्टूबर को प्रातः नौ बजे अचानक मणिरामदास छावनी के द्वार खुले और पूज्य वामदेव जी और महंत नृत्यगोपाल दास जी बाहर निकले। ठीक इसी समय वाल्मीकि मंदिर का कपाट खोल कर विहिप के महामंत्री अशोक सिंहल प्रकट हुए। उनके साथ थे उ.प्र. पुलिस के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीश चन्द्र दीक्षित। उन्हें देख कर सभी चौंक गये। एक सप्ताह से आन्दोलन के इन नेताओं की तलाश में पुलिस ने अयोध्या का चप्पा-चप्पा छान मारा था लेकिन उनकी हवा भी नहीं पा सकी थी। इन नेताओं ने जयश्री राम का उद्घोष कर जैसे ही हनुमान गढ़ी की ओर कदम बढ़ाये, घरों के दरवाजे खुलने लगे और हर घर से कारसेवक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की टोलियां निकलने लगीं। देखते ही देखते भगवा पटके सर से बांधे हजारों लोगों का काफिला बढ़ चला। सबसे आगे संत, फिर महिलायें और बच्चे, सबसे अंत में पुरुष। निहत्थे, निर्भीक कारसेवक रामनाम का संकीर्तन करते श्री राम जन्मस्थान की ओर आगे बढ़ रहे थे। प्रशासन हतप्रभ था। परिंदा भी पर न मार सके, ऐसी सुरक्षा का दावा करने वालों के होश उड़ गये।


हनुमान गढ़ी के पास पहुंचते ही बौखलाये प्रशासन ने निहत्थे कारसेवकों पर लाठी बरसाना प्रारंभ कर दिया। अशोक सिंहल के सिर पर लाठी का प्रहार हुआ, रक्त की धार बह चली। उनके मुख से निकले जय श्री राम के घोष ने कारसेवकों के पौरुष को जगा दिया। 64 वर्षीय श्रीश चन्द्र दीक्षित ढांचे के बाहर बनी आठ फीट ऊंची दीवार और उस पर लगी कंटीले तारों की बाड़ पार कर कब और कैसे रामलला के सामने जा पहुंचे, वे भी नहीं समझ सके। उनके साथ ही सैंकड़ों कारसेवक भी प्रांगण के अंदर थे। कोलकाता के रामकुमार और शरद कोठारी ने बीच में स्थित मुख्य गुम्बद पर हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक भगवा ध्वज फहरा दिया। फैजाबाद के एक नौजवान और एक साधु महाराज ने शेष दोनों गुम्बदों पर भी ध्वज लगा दिया। यह दोनों लोग ही गुम्बद से फिसल कर नीचे गिरे और रामकाज में बलिदान हो गये। उस रात अयोध्या सहित साकेत में अभूतपूर्व दीवाली मनायी गयी।


यह समाचार सुनते ही कि विवादित ढांचे पर कारसेवकों का कब्जा हो गया है, सुरक्षा के अहंकारपूर्ण दावे करने वाले मुख्यमंत्री मुलायम सिंह स्तब्ध रह गये। दूसरी ओर बलिदानी कारसेवकों के शोक तथा उनके शवों के अंतिम संस्कार के लिये 31 अक्तूबर और 01 नवम्बर को कारसेवा बन्द रही। 02 नवम्बर को रामदर्शन कर कारसेवकों के वापस जाने की घोषणा की गयी। कारसेवक रामलला के दर्शन कर अपने-अपने घरों को लौटने के लिये तैयार थे। प्रातः 11 बजे दिगम्बरी अखाड़े से परमहंस रामचन्द्र दास, मणिराम छावनी से महंत नृत्यगोपाल दास और सरयू के तट से बजरंग दल के संयोजक विनय कटियार तथा श्रंगारहाट से सुश्री उमा भारती के नेतृत्व में कारसेवकों के जत्थे राम जन्म भूमि की ओर बढ़े तो अपमान की आग में जल रहे मुख्यमंत्री मुलायम ने प्रतिशोध लेने की ठान ली थी। विनय कटियार और उमा भारती के नेतृत्व में चल रहे निहत्थे कारसेवकों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया। दिगम्बरी अखाड़े की ओर से परमहंस रामचन्द्र दास के नेतृत्व में आ रहे काफिले पर पीछे से अश्रुगैस के गोले फेंके गये और कारसेवक कुछ समझ पाते इससे पहले ही बिना किसी चेतावनी के गोलियों की वर्षा होने लगी। कारसेवकों के शरीर जय श्रीराम के उच्चारण के साथ कुछ क्षण तड़पते और फिर शांत हो जाते। दर्जनों कार सेवक मौत के मुंह में चले गए।


करीब दो वर्षों के बाद एक बार फिर 6 दिसम्बर 1992 को विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में कारसेवा की घोषणा की। उस समय प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान थे। कल्याण सिंह ने अदालत में लिखित दिया था कि विवादित ढांचे को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन कारेसवकों ने विवादित ढांचे को पूरी तह से धाराशायी कर दिया। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं। इसके बाद से यह मामला कोर्ट में चल रहा है।


अयोध्या विवाद में नया मोड़ तब आया जब 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू पक्ष को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्जा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायाधीशों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं, इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान पक्ष को दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से इंकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।


सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सात साल तक ऐसे ही पड़ा रहा। उच्चतम न्यायालय ने सात वर्ष बाद निर्णय लिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी, लेकिन एक पक्ष लगातार इस बात की कोशिश करता रहा कि किसी तरह से विवाद सुलझे नहीं। इंतजार इस बात का हो रहा था कि 2019 का लोकसभा चुनाव हार कर केन्द्र से मोदी सरकार बाहर हो जाए, लेकिन ऐसे लोगों के अरमानों पर तब पानी फिर गया, जब 2019 में भी मोदी सरकार को पूर्ण बहुमत मिल गया। इसी के बाद मंदिर निर्माण की राह आसान होती गई और दोबारा मोदी सरकार के गठन के लगभग पांच महीने बाद ही 09 नंवबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला भी सुना दिया।


पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला के हक में निर्णय सुनाया। शीर्ष अदालत ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को राम मंदिर बनाने के लिए तीन महीने में ट्रस्ट बनाने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि 2.77 एकड़ जमीन केंद्र सरकार के अधीन ही रहेगी। साथ ही मुस्लिम पक्ष को नई मस्जिद बनाने के लिए अलग से पांच एकड़ जमीन देने के भी निर्देश दिये। इसके अलावा कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े और शिया वक्फ बोर्ड के दावों को खारिज कर दिया। हालांकि निर्मोही अखाड़े को ट्रस्ट में जगह देने की अनुमति को स्वीकार कर लिया गया है।


बहरहाल, अयोध्या में पाँच सौ वर्षों के इंतजार के बाद राम मंदिर निर्माण की कवायद का तेज होना न केवल स्वाभाविक, बल्कि स्वागत-योग्य है। पांच अगस्त को प्रधानमंत्री के भूमि पूजन के साथ ही सब कुछ ठीक रहा, तो प्रभु श्रीराम का तीन मंजिला मंदिर साढ़े तीन साल में बनकर तैयार भी हो जाएगा। भूमि की उपलब्धता को देखते हुए मंदिर परिसर का आकार-विस्तार बढ़ाने का फैसला भी ठीक ही है। मंदिर के लिए 120 एकड़ तक जमीन उपलब्ध हो सकती है। पहले यह दायरा 67 एकड़ तक सीमित था। मंदिर की ऊंचाई 161 फुट होगी।


पांच अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी भूमि पूजन करेंगे, इसके साथ ही विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी का ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनवाएंगे नारा भी चरितार्थ हो जाएगा, जिसको लेकर कई बार बीजेपी को उलहाने भी मिलते रहे थे। खैर, प्रभु श्रीराम के मंदिर का शिलान्यास देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे, इसको लेकर थोड़ी-बहुत चर्चा और विवाद की भी शुरूआत हो गई है। कहा यह जा रहा है कि प्रधानमंत्री एक संवैधानिक पद है, इसलिए प्रधानमंत्री को इस तरह के कार्यक्रम से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ लोगों में अनायास भय व्याप्त होता है, लेकिन ऐसा कहने वालों को नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दुस्तान की किसी सरकार की धर्मस्थल के मामलों में लिप्तता कतई नई नहीं है। ऐसा देश में पहले भी होता रहा है। कुल मिलाकर भगवान श्रीराम ने भले ही 14 वर्षों का वनवास भोगा था, लेकिन उनके भक्तों को अपने अराध्य प्रभु राम के जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण के लिए पांच सौ वर्ष का लम्बा ‘वनवास’ भोगना पड़ा।


-संध्या दीक्षित