अदब-सराय बीकानेर के हफ़्तावार ऑनलाइन मुशाएरे का शानदार आगाज,देश के नामचीन शायरों ने अपनी रचनाओं से साहित्य के विभिन्न रंग बिखेरे


*रूदादे वफ़ा सब को सुनाई नही जाती*


*हर बात ज़माने को बताई नही जाती*


*कमज़र्फ रफ़ीकों पे भरोसा नहीं करना*


*शबनम से कभी प्यास बुझाई नहीं जाती*


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*उसकी नज़र में खोट जो आई तो यूँ हुआ*


*बरकत के साथ रिज़्क़ की लज़्ज़त चली गई*


     अदब-सराय बीकानेर के हफ़्तावार ऑनलाइन मुशाएरे में जब ये शे'र झांसी के शाइर और कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अब्दुल जब्बार 'शारिब' ने पेश किया तो महफ़िल की रंगत ही बदल गई, मुशाएरे में शामिल तमाम सामईन वाह-वाह कर उठे | फिर तो ग़ज़लों की ऐसी बयार बही की फ़ज़ा ख़ुशनुमा हो गई | आपकी ग़ज़ल के इस मतलअ़ और शे'र को सभी ने खूब पसंद किया -


*रूदादे वफ़ा सब को सुनाई नही जाती*


*हर बात ज़माने को बताई नही जाती*


*कमज़र्फ रफ़ीकों पे भरोसा नहीं करना*


*शबनम से कभी प्यास बुझाई नहीं जाती*


 कार्यक्रम की अध्यक्षता मेरठ के वरिष्ठ शायर डॉ कृष्ण कुमार बेदिल ने की | डॉ. बेदिल ने मुशाएरे में अपनी एक से बढ़कर एक उम्दा ग़ज़लें सुना कर मुशाएरे को परवान चढ़ाया | आपकी नये अंदाज़ और नये कहन ग़ज़लों की श्रोताओं ने दिल खोलकर ता'रीफ़ की और बार-बार सुनाने की फ़रमाइश की -


*बदल रही है चमन की फिज़ा पता है क्या।*


*नसीमे-सुब्ह का नश्तर कोई चुभा है क्या।*


*फिर इंक़लाब की आहट सुनाई देती है*


*क़फ़स को ले के परिन्दा कोई उड़ा है क्या।*


*सुना जो तुमने वो मैंने कभी कहा भी नहीं,*


*कहा जो मैंने वो तुमने कभी सुना है क्या।*


 आपकी मुरस्सा ग़ज़ल के इन शे'रों को सुनकर श्रोता झूम उठे


*वो शख़्स सर पे बुज़ुर्गों का हाथ हो जिसके,*


*चिराग़ उसका हवा से कभी बुझा है क्या |*


*तमाम उम्र सभी के दिलों पे राज किया,*


*कुछ अपने दिल का भी 'बेदिल'अता पता है क्या*


 मुशाएरे के *विशिष्ट अतिथि दिल्ली के शाइर और ग़ज़लों की महफ़िल समूह के एडमिन डॉ. अमर पंकज* की ग़ज़लों को भी ख़ूब सराहना मिली | नए तेवर की आपकी ग़ज़ल नये हौसलों से लबरेज़ होने का पैग़ाम देने में कामयाब रही -


*आँधियों में ज़ोर कितना आज़माते हम रहे*


*ज़िन्दगी तेरे तराने रोज़ गाते हम रहे*


*हाथ की उलझी लकीरों पर करें विश्वास क्यों*


*जब कभी उजड़ा चमन तो गुल खिलाते हम रहे*


 आपकी ग़ज़ल के इन शे'रों को भी सराहना मिली -


*फूल की मुस्कान कल थी आज पत्थर भाग्य में*


*प्यार से पिघला दो पत्थर यह सिखाते हम रहे*


*झूठ ही युगधर्म है कैसे कहो हम मान लें*


*सांकरी सच की गली चलकर दिखाते हम रहे*


 


*दिन पुराने याद करके खंडहर ग़मगीन था*


*कैसे करता ग़म गलत उसको रुलाते हम रहे*


 


*हाथ की उलझी लकीरों पर करें विश्वास क्यों*


*जब कभी उजड़ा चमन तो गुल खिलाते हम रहे*


मेरठ की शाइरा डॉ.यासमीन मूमल ने अपनी नये अंदाज़ं की ग़ज़ल सुना कर ख़ूब वाहवाही लूटी -


*निकल कर वादिये नफ़रत से ढीले आप हो जाएं।*


*मुहब्बत की हो जब बारिश तो गीले आप हो जाएं।।*


*ये मेरा फ़र्ज़ था सच्चाई सबके सामने रखना।*


*यही मैं चाहती थी लाल पीले आप हो जाएं।।*


आगरा के शायर भरतदीप माथुर ने ताजमहल की ता'रीफ़ में कही ग़ज़ल से ताज के सौंदर्य को सामने रखा -


*तहज़ीब की मिट्टी में सुलहकुल का कँवल है*


*ग़ालिब का सुख़न है यहाँ नीरज की ग़ज़ल है*


*है सूर की धरती यहीं अक़बर का मक़बरा*


*ये शह्र-ए-आगरा है यहाँ ताज महल है*


 आपकी ग़ज़ल के इस मतलअ़ और शे'र को भी ख़ूब सराहा गया -


*बिखरा दे लाखों गुल-पारे दरिया में*


*नेकी कर और डाल दे प्यारे दरिया में* 


*छाए हैं नफ़रत के बादल अम्बर पर*


*उतरें कैसे चाँद-सितारे दरिया में*


  संस्था अध्यक्ष क़ासिम बीकानेरी की देशभक्ति के भावों से लबरेज़ ग़ज़ल को भरपूर ता'रीफ़ मिली -


*ये मेरा दिल है लिख देना तू मेरी जान लिख देना* 


*कफ़न के हर सिरे पर मेरे हिंदुस्तान लिख देना*


*हमें काशी से उल्फ़त है हमें का'बे से निस्बत है*


*सभी पर है निछावर ये हमारी जान लिख देना*


 संस्था सचिव रांची की शाइरा रेणु त्रिवेदी मिश्रा की हालाते-हाज़िरा पर कही ग़ज़ल को भी ख़ूब पसंद किया गया -


*मुहर झूठ की आवेदन पर,हर हस्ताक्षर जाली है*


*कागज़ पर ही काम हो गया,सड़क आज भी खाली है।*


*घोटाले में गर्दन डूबी, कर्जे सारे माफ हुए*


*हर दिन उनकी ईद हुई,जिनकी हर रात दीवाली है*


 संस्था उपाध्यक्ष दतिया के नौजवान शायर दिल शेर दिल की ग़ज़ल में फ़लसफियाना रंग नज़र आया जिसे ख़ूब सराहा गया -


*ज़िन्दगी सच है तेरा कोई ऐतबार नहीं।*


*तेरी चाहत में मगर कौन गिरफ़्तार नहीं।*


*सरफ़रोशी का वो जज़्बा है कहाँ अब यारो,*


*जान देने को वतन पे कोई तैयार नहीं*. छबड़ा की शायर अब्दुल सलाम 'मुज़्तर' ने बेहतरीन तरन्नुम के साथ क़ौमी एकता पर ग़ज़ल सुनाकर कार्यक्रम को परवान चढ़ाया -


*सिख हैं, इसाई हैं, हिन्दू हैं, मुसलमान हैं हम*


*यह भी तस्लीम करें आप कि इंसान है हम*


*दौरे-हाज़िर ने हमें अपनी बता दी औकात*


*वरना माज़ी में समझते थे कि भगवान हैं हम*


अहमदाबाद के कवि कुमार अहमदाबादी की ग़ज़ल ने कार्यक्रम में नया रंग भरा -


*बिंदिया के, मन सपन है, प्यास मीठी जगा दो*


*साथी मेरे, मन चमन के, आज शोले बुझा दो*


*सोचो जानो, बलम मन ये, बावरा क्यों हुआ है*


*क्यों काया का, कण कण कहे, कंचुकी को सजा दो*


नवलगढ़ के नौजवान कवि मुकेश मारवाड़ी के जोशीले कलाम ने देशभक्ति का जज़्बा कायम कर दिया -


*मैं काश्मीर कि घाटीयों में कहीं खो जाऊँगा |*


*बीज राष्ट्र भक्ति का पर हर तन में बो जाऊँगा |*


*या तो गाढ़ दूँगा तिरंगा दुश्मन कि छाती पर |*


*या फिर कफ़न में ओढ़ कर सो जाऊँगा |*


 आरंभ में डॉ. यासमीन मूमल ने शिव-वंदना प्रस्तुत की |सभी आगंतुकों का स्वागत रेणु त्रिवेदी मिश्रा ने किया | सभी का शुक्रिया दिलशेर 'दिल' ने ज्ञापित किया कार्यक्रम का संचालन क़ासिम बीकानेरी ने किया |


 आगामी कड़ी में मेरठ के वरिष्ठ शाइर डॉ कृष्ण कुमार 'बेदिल' के 78 वें जन्मदिवस पर संस्था की तरफ से उनके सम्मान में एक मुशाइरा रखा जा रहा है |



 


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