लॉकडाउन के दौरान पूरा वेतन देने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक,पेमेंट देने में असमर्थ एम्प्लॉयर्स पर केस न करने का निर्देश, नरेंद्र पंडित की रिपोर्ट


नई  दिल्ली,सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन में आर्थिक नुकसान से जूझ रहे निजी कंपनियों को बड़ी राहत दी है, कोर्ट ने पूरे भारत में किसी भी ऐसी कंपनी पर केस नहीं करने को कहा जो पूरा वेतन नहीं दे पा रही है।


   ज्ञात हो कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 29 मार्च को एक सर्कुलर के जरिए कर्मचारियों को फुल पेमेंट का निर्देश दिया था।


 देश की सर्वोच्च अदालत नेत शुक्रवार को पूरे देश में प्रशासन को आदेश दिया कि वे उन नियोक्ताओं (एंप्लॉयर्स) के खिलाफ मुकदमा न चलाएं, जो कोविड- 19 के कारण राष्ट्रव्यापी बंद के दौरान कामगारों को पूरे पारिश्रमिक का भुगतान करने में असमर्थ हैं।


फैसले के मुख्य बिंदु


♟️ *सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब...*
न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, संजय किशन कौल और बीआर गवई की पीठ ने केंद्र और राज्यों से मजदूरी का भुगतान न कर पाने पर निजी कंपनियों, कारखानों आदि के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाने को कहा। 
      शीर्ष अदालत ने औद्योगिक इकाइयों की ओर से दायर याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा है। 
      ध्यान रहे कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 29 मार्च को एक सर्कुलर के जरिए निजी प्रतिष्ठानों को निर्देश दिया था कि वो राष्ट्रव्यापी बंद के दौरान भी कर्मचारियों को पूरा पेमेंट दें।।नरेन्द्र पंडित।


♟️ *याचिकाकर्ताओं ने मांगी पेमेंट पर फैसला लेने की छूट*
औद्योगिक इकाइयां यह दावा करते हुए अदालत चली गईं कि उनके पास भुगतान करने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि उत्पादन ठप पड़ा हुआ है।
      याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत से कहा कि कोरोनावायरस महामारी के मद्देनजर लागू राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान संगठनों को उनके कार्यबल (वर्कफोर्स) को पेमेंट करने से पूरी तरह से छूट दी जानी चाहिए। 
      याचिका मुंबई के एक कपड़ा फर्म और 41 छोटे पैमाने के संगठनों के एक पंजाब आधारित समूह की ओर से दायर की गई थी।


♟️ *संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का दिया हवाला*
याचिका में गृह मंत्रालय के 29 मार्च के आदेश को रद्द करने मांग की गई। याचिकाकर्ताओं ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 10(2) (I) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। 
      पंजाब स्थित लुधियाना हैंड टूल्स एसोसिएशन ने दावा किया कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत 29 मार्च को दिया गृह मंत्रालय का आदेश, संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(G), 265 और 300 का उल्लंघन है, जिसे वापस लिया जाना चाहिए।


नरेन्द्र पंडित
  (पत्रकार)


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