क्या ताली थाली और घंटे से हो जाएगा कोरोनामहामारी से बचाव,या उत्साह जगाने का तरीका है


जब यह पता चला कि 3 अप्रैल को प्रधानमन्त्री जी राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे तो सप्ताह भर से घरों में कैद लोगों को एक आशा बंधी कि शायद सरकार ने वैश्विक महामारी से निबटने के लिए पर्याप्त इंतजाम कर लिए हैं जिसकी घोषणा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी करेंगे।


 प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर 5 अप्रैल को रात 9 बजे देश भर में जले दियों से दीपावली जैसा नजारा दिखायी दिया। प्रधानमन्त्री जी ने तो मात्र एक दिया जलाने की अपील की थी परन्तु लोगों ने उत्साह में आकर अपनी-अपनी बालकनियों और दरवाजों को दीप मालाओं से सजा दिया। आम से लेकर खास तक, मन्त्री से लेकर सन्तरी तक, राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक हर किसी ने मोदी जी की अपील पर अमल करने का पूर्ण प्रयास किया। अनेक लोगों ने तो पटाखे भी जमकर फोड़े। लगा जैसे पूरा देश दोबारा दीवाली मना रहा हो लेकिन दीयों की जगमगाहट के बीच शायद ही किसी ने यह विचार किया हो कि देश के उन 89 परिवारों पर क्या बीत रही होगी जिनके चिराग कोविड-19 की महामारी ने बुझा दिये हैं और उन 3900 लोगों की मनःस्थिति क्या होगी जो इस महामारी की चपेट में आकर जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।


दीयों की जगमगाहट से प्रसन्न सत्ता पक्ष जहाँ अन्तर्मन से प्रधानमन्त्री की बढ़ती लोकप्रियता का दर्शन करते हुए भविष्य के परिणामों का सुखद आभास कर रहा है वहीँ बहिर्मन से इसे देश की एक जुटता का द्योतक बताते हुए नहीं थक रहा है। विपक्षी दल इसे भाजपा के स्थापना दिवस 6 अप्रैल की पूर्व सन्ध्या पर अघोषित जश्न की संज्ञा दे रहे हैं तो अन्ध भक्त और स्वयंभू विद्वान इसे सनातन धर्म के पौराणिक विज्ञान से जोड़कर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई का एक बड़ा हथियार बता रहे हैं।
 
कहा जाता है कि भगवान राम रावण का वध करके जब अयोध्या लौटे थे तब लोगों ने प्रसन्नता के आवेग में पूरे नगर को दीप मालाओं से सजा दिया था। इससे यह सिद्ध होता है कि दीप मालायें विजयोत्सव का प्रतीक हैं। इधर कुछ वर्षों से अन्याय के विरोध स्वरूप मोमबत्तियां जलाने की परम्परा भी शुरू हुई है। निर्भया-काण्ड के विरोध स्वरूप पूरे देश में मोमबत्ती जलाकर लोगों ने अन्याय और लचर कानून-व्यवस्था का विरोध किया था जबकि कोरोना संक्रमण के मामले में दोनों में से कोई भी एक कारण नहीं है। लाख प्रयास के बावजूद कोरोना संक्रमित मरीजों तथा उससे मरने वालों की संख्या का ग्राफ नित्य निरन्तर बढ़ रहा है। अतः यह कोविड-19 पर जीत का विजयोत्सव नहीं हो सकता है। कोरोना के प्रति सरकार की लचर व्यवस्था का विरोध इसे कह नहीं सकते हैं, क्योंकि दीप प्रज्ज्वलन का आह्वान स्वयं प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किया था।


जब यह पता चला कि 3 अप्रैल को प्रधानमन्त्री जी राष्ट्र को सम्बोधित करेंगे तो सप्ताह भर से घरों में कैद लोगों को एक आशा बंधी कि शायद सरकार ने वैश्विक महामारी से निबटने के लिए पर्याप्त इंतजाम कर लिए हैं जिसकी घोषणा प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी करेंगे। वह यह बतायेंगे कि पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीपी) की कमी को किस हद तक पूरा कर लिया गया है, जिसकी भारी कमी ने स्वास्थ्यकर्मियों का जीवन खतरे में डाल दिया है। वह यह भी बतायेंगे कि इस महामारी से निबटने के लिए राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर और क्या-क्या तरीके खोज लिये गये हैं, वह यह भी बतायेंगे कि लॉकडाउन के चलते भुखमरी की कगार पर पहुँच चुके लाखों परिवारों के लिए सरकार ने क्या व्यवस्था की है, वह यह भी बतायेंगे कि लॉकडाउन यदि 14 अप्रैल से आगे बढ़ा तो ऐसी स्थिति में लोगों की बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी की जायेंगी, वह भी बतायेंगे कि लॉकडाउन के कारण रोजगार से वंचित हुए लाखों निजी कर्मियों तथा दिहाड़ी मजदूरों के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है, वह यह भी बतायेंगे कि कोरोना संक्रमण के विस्तार के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दोषी लोगों के विरुद्ध सरकार ने क्या कार्रवाई सुनिश्चित की है, वह यह भी बतायेंगे कि तबलीगी जमात में शामिल होने वाले सैंकड़ों विदेशियों के मरकज तक पहुँचने में खुफिया तन्त्र की चूक के लिए दोषी अधिकारियों पर सरकार क्या कार्रवाई करेगी। लेकिन इस सबसे पृथक दीये जलाकर विश्व के सामने देश की एकता व अखण्डता का ढिंढोरा पीटने वाली प्रधानमन्त्री की घोषणा ने देश की गरीब जनता को निराश तथा बुद्धिजीवी वर्ग को अवाक ही किया। दीये जलाना उस दिन सबसे अच्छा लगेगा जिस दिन शाम को यह समाचार प्राप्त होगा कि आज देश में एक भी कोविड-19 का रोगी नहीं बढ़ा है और न ही आज किसी संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु हुई है। तभी इसे कोरोना के विरुद्ध लड़ाई की प्रथम जीत का जश्न कहा जा सकता है।


इस दीप प्रज्ज्वलन ने कोरोना संक्रमण के शिकार लोगों को मुंह चिढ़ाने का तो काम किया ही है, साथ ही उन डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को भी हतोत्साहित किया है जो इस महामारी से लड़ाई में संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों, नर्सों तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के साथ हो रही अभद्रता की घटनाओं ने पहले ही उनका मनोबल तोड़ रखा है। उन्हें कहीं प्लास्टिक के रेनकोट पहनकर तो कहीं हेलमेट लगाकर स्वयं की सुरक्षा करनी पड़ रही है। पीपीपी की कमी के चलते अनेक चिकित्सक तो स्वयं ही इस संक्रमण के शिकार हो चुके हैं। इस तरह से दूसरों का जीवन बचाने वालों का स्वयं का ही जीवन संकट में पड़ गया है। इसके लिए दोषी सिर्फ और सिर्फ वह व्यवस्था ही है जिसके तहत वह काम कर रहे हैं। इन्वेस्ट इण्डिया के अनुसार देश को 3.8 करोड़ से भी अधिक मास्क और 62 लाख से भी अधिक पीपीई किट्स की तत्काल आवश्यकता है जबकि भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय के अनुसार देश के विभिन्न अस्पतालों में मात्र 3.34 लाख ही पीपीई किट्स उपलब्ध हैं और लगभग 60 हजार पीपीई किट्स हाल ही में खरीदी गयी हैं। विदित हो कि पीपीई किट्स में मास्क, रेस्पिरेटर्स, आई-शील्ड्स, ग्लब्स तथा गाउन आदि होता है।


निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पूरे विश्व की रफ़्तार पर अचानक से विराम लगा देने वाली इस भयंकर महामारी से निबटने के लिए जो गम्भीरता और तत्परता दिखायी जानी चाहिए उसका दर्शन कहीं भी नहीं हो रहा है। ताली, थाली, शंख और घंटा बजवाने से या दीये जलवाने से कहीं अधिक आवश्यक है कि इस महामारी से निबटने के लिए प्रभावी कदम उठाये जायें। 130 करोड़ की आबादी को बहुत लम्बे समय तक घरों में कैद नहीं किया जा सकता है। वह भी तब जब आधे से अधिक जनसंख्या के पास बुनियादी जरूरतों का सर्वथा अभाव हो।


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