लोहागढ़,झासी की रानी के मदद में अंग्रेजो को घंटों रोका,वीरता भरी कहानी

 झाँसी: लोहागढ़- 1857 गदर का साक्षी है यहाँ का किला, जब पूरा गांव कुल्हाड़ी और तलवार जैसे हथियारों से अंग्रेजी फौज की एनफील्ड रायफलों से लङा था और जीता भी था।
बात उन दिनों की है जब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सन् 1858 के माह अप्रेल में झांसी किले को छोड़कर भाण्डेर के रास्ते अपने बचे हुए सैनिकों के साथ कालपी जा रहीं थीं, उनका पीछा अंग्रेज़ों की भारी भरकम फौज कर रही थी, रानी के बारे में जब लोहागढ़ के गुर्जर राजा हिंदूपत को पता चला तो उन्होंने पूरे गाँव वासियों को अंग्रेज़ों को रोकने के लिए प्रेरित किया, लोहागढ़ के वीर किसान योद्धा वीर सिंह, मुकुंद सिंह और पठान रज्जब बेग ने अपने युवा साथियों के साथ रानी झांसी का पीछा कर रही अंग्रेजी फौज को युद्ध के लिए ललकारा, जबरदस्त संघर्ष शुरू हो गया, गांव के पठानों और किसानों, महिलाओं ने अपने हंसिया,तलवार, कुल्हाड़ी जैसे हथियारों से अंग्रेज़ों के होश उङा दिए लेकिन उन दिनों अंग्रेजी सेना के पास ईनफील्ड रायफल थी,….संघर्ष मे तकरीबन 500 से अधिक लोहागढ़ वासी शहीद हो गए ।
रानी झांसी सुरक्षित कालपी पहुँच गईं।ग्राम वासियों के जोश से अंग्रेजी सेना पीछे हट गई और लोहागढ़ की जीत हुई। कहा जाता है कि पठान रज्जब बेग का उसी दिन विवाह हुआ था,लेकिन विवाह के बाद सीधे वो युद्ध भूमि में पहुँच गये और सेकङों अंग्रेजी सैनिकों को मारकर शहीद हो गये, आज भी उनकी कब्र गांव में मौजूद है। लोहागढ़ के अमर शहीदों को शत शत नमन। 


 द्वारा मृदुल पांडे


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