गजलों की महफ़िल(दिल्ली) की 26 वी कड़ी में बस्ती (यू पी) के शायर डॉ पंकज सोनी ने मचाया धमाल,अपनी रूमानी गजलों से श्रोताओं के दिल को लूटा,लोगो ने जमकर की वाह वाही

साहित्य:: वर्तमान कोरोना काल में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काफी विसंगति आ चुकी है, ऐसा लगता है कि ज़िंदगी ठहर सी गयी है! साहित्य का क्षेत्र भी इसके दुष्प्रभावों से अछूता नहीं बचा है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य-प्रेमियों और साहित्यकारों द्वारा वर्ष भर चलाये जाने वाले कवि सम्मेलनों, मुशायरों, सम्मान समारोहों समेत हर प्रकार के आयोजनों पर रोक लग गयी है। लेकिन कहते हैं न कि मनुष्य की अदम्य जीजिविषा उसे हर परिस्थिति का अनुकूलन करने में सक्षम बना देती है, सो हम सबने इस भीषण अवसाद की घड़ी में भी ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीने के लिये नये-नये रास्तों की तलाश कर ली है। ज़िंदगी की इसी खोज़ का परिणाम है कि नवीन संचार माध्यमों का सहारा लेकर हम अपने-अपने घरों में क़ैद होते हुये भी वेबीनार या साहित्य-समारोहों का आयोजन कर रहे हैं। इसीलिए हम देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ महीनों से साहित्यिक-साँस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के निमित्त फेसबुक लाइव एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। फेसबुक लाइव के माध्यम से हम अपने पसंदीदा कवियों-शायरों से रूबरू होकर उनकी रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं ।


इसी क्रम में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में लगी हुई ऐतिहासिक संस्था "पंकज-गोष्ठी" भी निरंतर क्रियाशील है। "पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के तत्वावधान में चलने वाली प्रख्यात साहित्यिक संस्था "गजलों की महफ़िल (दिल्ली)" भी लगातार आॅनलाइन मुशायरों एवं लाइव कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत)" के अध्यक्ष डाॅ विश्वनाथ झा ने हमारे संवाददाता को बताया कि "न्यास" की ओर से हम भारत के विभिन्न शहरों में साहित्यिक और साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इसी क्रम में "ग़ज़लों की महफिल (दिल्ली)" की ओर से आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" में शायरों के अलावा ग़ज़ल गायकों को भी सप्ताह में एक दिन आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया, ताकि पटल के शायरों की ग़ज़लों को स्वर बद्ध कर करके ग़ज़ल प्रेमियों तक पहुँचाया जा सके, साथ ही साथ नामचीन ग़ज़लकारों की ग़ज़लों को भी सुना सके। 


अतः 13 सितम्बर, 2020 से यह प्रख्यात संस्था "ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)", अपने लाइव कार्यक्रम श्रृंखला के तीसरे चरण में प्रवेश कर गयी है।


इस तीसरे चरण में तथा लाइव @ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की 26 वीं प्रस्तुति के रूप में रविवार , 27 सितम्बर, 2020, शाम 4 बजे से जिला बस्ती उत्तर प्रदेश के प्रख्यात शायर डाॅ पंकज कुमार सोनी जी ने अपनी ख़ूबसूरत और धारदार ग़ज़लें सुनाकर आज की शाम को एक यादगार शाम बना दिया। ग़ज़ल की बारीकियों को ध्यान में रखते हुई कहीं गयी आज के दौर में शायर मोहतरम डाॅ पंकज सोनी जी की रूमानी ग़ज़लों ने तो जादू ही कर दिया तथा सबको अपने भूत काल की याद दिलाते हुए और लगभग घंटे भर बाँधे रखा रखा।



ठीक 4 बजे डाॅ पंकज कुमार सोनी जी जी पटल पर उपस्थित हो गए परंतु नेट प्राब्लम के कारण थोड़ा देर से, लगभग 4:30 बजे से ही उनका प्रोग्राम शुरू हो सका। तबसे लगभग घंटे भर तक वे एक से बढ़कर एक बेहतरीन ग़ज़लें सुनाते रहे।


आज की हिन्दुस्तानी ग़ज़लों की बारीकियों और अरूज़ का ध्यान रखते हुए ग़ज़लगो डाॅ पंकज कुमार सोनी जी द्वारा सुनायी गई ग़ज़लें उनके मेयार की गवाही दे देतीं हैं:


ग़ज़ल:


बहर रमल मुसम्मन मख़बून महजूफ़


जिंदगी मैंने तुझे रंग बदलते देखा


इक नया ख़्वाब इन्हीं आंख मे पलते देखा। 


 


जाने वो कौन सी थी याद जो उनको अाई


उनकी आंखो को समुन्दर में बदलते देखा।।


 


वस्ल की रात उन्हें याद न मिलना आया


बाद की रात कई बार मचलते देखा। 


 


शब ए फुरकत न थी मुझको भी गवारा क्यू की


मैने फुरकत में उन्हें आज फिसलते देखा।।


 


सुर्ख फूलों पे नया रंग सा अब छाया है


मुद्दतो बाद उसे बाग मे चलते देखा।।


 


क्या पता आज मुझे उसने बुलाया क्यों है


आज मुद्दत से उन्हें ढंग बदलते देखा।।


 


आज की रात मुझे नींद नहीं आएगी


शाम को उनको चिरागो सा जो जलते देखा।।


 


आज जाएगी मिरी जान भी सुन लो पंकज


बारजे पर मै नया चांद निकलते देखा।।


    ठीक इसी प्रकार डाॅ पंकज कुमार सोनी जी की ये ग़ज़ल भी उनके मेयार की गवाही देती है:


ग़ज़ल:


बहर रमल मुसद्दस महजूफ़


आप की जब बात आई क्या करे


आप यू नज़रे फिराई क्या करे।। 


 


मत कुरेंदो आज मेरे जख्म तुम


मुश्किलों से सूख पाई क्या करे।।


 


रूह बनकर बस गई तस्वीर सी


दिल मे मेरे तू ही छाई क्या करे।।


 


मुझको तो भाए मरासिम* इश्क के


तुमने दिल पत्थर बनाई क्या करे।।


 


हम वफा के नाम पर मरते रहे


तुमने उल्फत न निभाई क्या करे।।


 


दुख भरी इक दास्ता उसकी भी थी


खोल कर मुझको सुनाई क्या करें।।


 


था मुहब्बत से भरा ये दिल मिरा


तुमने यू नश्तर चलाई क्या करे।।


 


दिल की बातें मै बया करता मगर 


तुमने यू नज़रे चुराई क्या करे।।


 


हुस्न पंकज हो गया अब बेवफ़ा


वक्त पर अक्कल न आई क्या करे।।


  


*मरासिम/रिलेशन,रूल्स


या फिर डाॅ पंकज कुमार सोनी जी की इस ग़ज़ल के कुछ अशआर देखें:


ग़ज़ल


बहर मजा़रिह मुसमन अख़रब मकफूफ महज़ूफ


गर आज भी मेरे हो बता क्यों नहीं देते


दिल चीर के तुम आज दिखा क्यों नहीं देते।।


 


जो मैंने लिखा तुमको था खत खून से अपने


वो किस लिये रक्खे हो जला क्यों नहीं देते।।


 


क्यों तुमने हथेली पर मेहंदी से लिखा नाम


गर दिल मे नहीं हूं तो मिटा क्यों नहीं देते।।


 


मै हुस्न का शैदाइ हूॅ, बस ये ही समझना


दीदार मुझे हुस्न करा क्यों नहीं देते।।


 


आगाज़ मुहब्बत का बहुत अच्छा था लेकिन


अंजाम मुहब्बत का बता क्यों नहीं देते।।


 


ये चांद सा चेहरा तिरा,है बादलो सी ओट


रुखसार पे जो पर्दा है,उठा क्यों नहीं देते।।


 


दिल तुमको दे दिया ,कहोगे जान भी देंगे


जज्बा ए मोहब्बत को जता क्यों नहीं देते।।


 


हो गई है खता क्या, जी मैंने प्यार किया है


गर तेरा खतावर हूं,सज़ा क्यों नहीं देते।।


 


पंकज से गिला तुमको कुछ भी नहीं है तो


फिर अपनी शिक़ायत को भुला क्यों नहीं देते।।    


          सोनी जी इस ग़ज़ल के भी कुछ शेर देखें :


ग़ज़ल


बहर खफीफ मुसद्दस मखबून महफूज मकतुअ


आज भी वो नजर नहीं आती


थी जो जाने जिगर नहीं आती


 


तेरी उम्मीद पर है दुनिया अब


कोइ उम्मीद गर नहीं आती


 


राह रौ राह भी परीशां हैं


राह में अब शजर नहीं आती।।


 


सब्र की आज इंतिहा हो गई


नींद क्यों रात भर नहीं आती।।


 


जिन्दगी बीत गई अॅधेरो में


आज भी क्यों सहर नहीं आती


 


उम्र भर मै चला अकेले ही


साथ में रहगुजर नहीं आती।।


 


शहर में थे सभी चाहने वाले


उसके होने की खबर नहीं आती।।


 


ग़ज़ल कहता हू दोस्तो लेकिन


मुझको कोई बहर नहीं आती


इसी तरह से सोनी जी की इस ग़ज़ल के भी इन शेरों को देखें:


उस्ताद अमीर खुसरो की प्रसिद्ध ग़ज़ल 


जि हाले मिस्की मकुन तगाफुल दुराय नैना बनाय बतिया


पर आधारित ये ग़ज़ल 


हमारी उल्फत के हौसलों पर न जुल्म इतना किया करो तुम


अभी तो मैंने कहा नहीं कि वफा के बदले वफा करो तुम।।


 


खबर किसे है हुआ है अब क्या उसी से पूछो जो है खतावर


नहीं बताए अगर वो कुछ भी तभी किसी से पता करो तुम।।


 


कदम तिरे है जो डगमगाए उसी की खातिर सभॅल भी जाओ


मरीज है वो तुम्हारी खातिर नजर की उसकी दवा करो तुम।।


 


झुकी झुकी सी निगाहें उसकी उठा भी देंगी अगर कहोगे


अगर उठाए गुलाबी चेहरा तो फिर शुक्रिया अदा करो तुम।। 


 


उठा के तुम भी नकाब उनका लिखो इबारत मुहब्बतो की


बता दो,तुमको हुई मुहब्बत,फ़साना उनका लिखा करो तुम।।


 


घना है बादल हसीं है मौसम तिरे ख़यालो मे दिल फिदा है


न कोई वादा न कोई शिकवा न बेसबब यूॅ गिला करो तुम।।


 


करीब उनके अगर मै जाऊ खिला हुआ हो गुलाब जैसे


मुहब्बतो से भरा जो दिल था दिखा के उनको पिया करो तुम।।


 


जला है मेरा तो आशियाना उन्हें खबर ही अभी नहीं है


जले न मेरा ये दिल कहीं अब मिरे सुकूं की दुआ करो तुम।।


 


नहीं है मेरा जहां मे कोई तुम्ही थे दिल के सुकून मेरे


करीब पंकज था जब तुम्हारे तभी की हालत बया करो तुम।।


और फिर ये गज़ल 


बहर रमल मुसम्मन महजूफ


आंसुओ में आज सब अरमान मेरे बह गए


बनते बनते दिल के वो मेहमान मेरे रह गए।।


 


रहते थे दिल में कभी हक से जता कर प्यार को


आज मजबूरी में उनका ज़ुल्म सारा सह गए।।


 


जो नहीं लेते वफा का नाम भूले से कभी


वो न जानेंगे दिलों का दर्द कैसे सह गए।।


 


जो जलाते ही रहें है प्यार की सब बस्तियां


जब उन्हीं का घर जला तब वो बुझाते रह गए।।


 


आज का वादा किया था घर पे आयेंगे मिरे


और फिर आए नहीं गो हम बुलाते रह गए।।


 


उनका आना तय नहीं पर हम खड़े थे राह में


वो उधर आए मगर चेहरा दिखा कर रह गए।।


 


आजकल चर्चे तेरे है शह्र सारा जल गया


हुस्न की थी आग तेरी खाक हो कर रह गए।। 


 


तुमसे अब शिकवा गिला भी हम बता कर क्या करे


दर्मिया जो थे मिरे अब फासले पे रह गए।।


 


आज तू मेरे लिए सब छोड़ कर क्यों आ गई


अब बचा अरमाॅ न कोई जो भी थे वो बह गए।।


 


अपनी किस्मत ही नहीं थी आज पंकज जान लो


जो बनाया आशियाना आज वो भी ढह गए।।      


फिर इस ग़ज़ल को देखिए 


ग़ज़ल


बहर रमल मुसम्मन महजुफ


रूठ कर फिर मान जाना,याद है अब भी मुझे


तेरा वो नखरा दिखाना,याद है अब भी मुझे


 


दिल पे जो गुजरी थी मेरे तुम न जानोगे कभी


फिर वही गुजरा जमाना,याद है अब भी मुझे ||


 


वो तिरी गुस्ताखिया सब आज भी तो याद है


वो सभी किस्सा पुराना,याद है अब भी मुझे||


 


सुर्खरू चेहरे का तेरे,रंग मुझको याद है


देख कर मुझको लजाना,याद हैअब भी मुझे ||


 


वो नहीं था वेवफा पर लोग तो समझे यही


मुझको ना आया निभाना,याद हैअब भी मुझे ||


 


मद भरी जैसे सुराही छलके आँखो में तेरी


तुझको ना आया पिलाना,याद है अब भी मुझे||


 


दिल लगा कर छोड़ देना कोइ सीखे आपसे


आपका ये ढब पुराना,याद है अब भी मुझे|


 


छोड़ कर जब से गये हो दिल कभी फिर ना खिला


फिर न आया दिन सुहाना,याद है अब भी मुझे||


 


सुर्ख फूलों को किताबो में छुपा लेना मगर


मुझसे मिलकर भूल जाना,याद है अब भी मुझे।।


 


लिख दिया था खत मे तूने,आज भी हूँ आपकी


पर तिरा वो भूल जाना,याद है अब भी मुझे|


 


वस्ल की चाहत नही थी दिल को थी दिल की लगी


प्यार मेरा था रुहाना,याद हैअब भी मुझे ||


 


भूलने की वो अदा बाकी है पंकज आज भी


मेरे थे तुम जाने जाना,याद हैअब भी मुझे ||


 फिर ये ग़ज़ल उन्होंने सुनायी 


बहर रमल मुसम्मन महजूफ


हुस्न वाले दिल जलाने की ज़रूरत क्य़ा तुम्हें 


मुझको यूँ आंखे दिखाने की ज़रूरत क्य़ा तुम्हें। 


 


कत्ल ही करना हो ग़र तो चीर दो सीना मिरा 


बे सबब खंजर दिखाने की ज़रूरत क्य़ा तुम्हें। 


 


इश्क़ करने का सलीका जब नहीं महबूब में 


,तीर नज़रों से चलाने की जरूरत क्या तुम्हें।


 


तोड़ डाला दिल मिरा जैसे कोई हो आइना 


और अब मुझको मनाने की ज़रूरत क्या तुम्हें। 


 


तुझमे थी बेशक अदाएं, रह गई इतनी कमी 


दिल रकीबो से मिलाने की ज़रूरत क्य़ा तुम्हें। 


 


जब भटक कर मैकदे में आ गया हूँ साकिया 


बिन पिलाए ही भगाने की ज़रूरत क्य़ा तुम्हें। 


 


था पता तुमको मिरे दुश्मन कई है शहर में 


रात मेरी छत पे आने की ज़रूरत क्या तुम्हें


 


रात भर छायी हुई थी हुस्न पर मदहोशिया


इस कदर मुझको सताने की जरूरत क्या तुम्हें 


 


बेवफा होना ही था तो क्यों जगाई हसरतें 


तोड़ कर दिल खिलखिलाने की ज़रूरत क्या तुम्हें 


 


लूटकर मेरा जहां जब चल दिये थे छोड़कर ।


आज नजरों को चुराने की जरूरत क्या तुम्हें ।


 


हाथ में लेकर सुराही मद भरा उसमे तो फिर


जाम आंखों से पिलाने की जरूरत क्या तुम्हे


 


लफ्ज़ तक खामोश हैं जब मुद्दतों के बाद भी ।


आज पंकज को बुलाने की जरूरत क्या तुम्हें


और फिर इस ग़ज़ल ने महफ़िल में रंग भर दिया 


बहर हजज मुसम्मन सालिम


उन्हें ये गीत चाहत के सुना कर क्या करेगे हम


दरे दौलत पे उनके सर झुकाकर,क्या करेगे हम।।


 


सुना है डूबती है कस्तिया,जब पास सहिल हो


मिलेगा क्या तुम्हे कश्ती डुबाकर,क्या करेगे हम


 


हमे तो चाहिए था प्यार तेरा ऐ मेरे हमदम


मिलेगा क्या तुम्हे हमको सताकर,क्या करेगे हम।


 


तुम्हारी सादगी पे जब फिदा परवाने महफ़िल में 


तुम्ही आओगे जब चेहरा सजाकर,क्या करेगे हम।।


 


लगा देता जबकि आग महफ़िल में तुम्हारा हुस्न


दिवाना कर दिया पागल बनाकर,क्या करेगे हम।।


 


तुम्हे हमसे मुहब्बत हो न हो पर याद ये रखना


चले जाओगे तुम मुझको भुलाकर,क्या करेगे हम।।


 


सनम तुमको हमारे प्यार का है वास्ता सुन लो


मिलेगा क्या मुझे सपना दिखाकर,क्या करेगे हम।। 


 


न तुम इकरार करते हो न तुम इनकार करते हो


तेरी उल्फत मे जां अपना लुटाकर,क्या करेगे हम।। 


 


हमारी हर खुशी तेरी हमारी जिंदगानी भी


तुम्हारी याद में आंसू बहाकर,क्या करेगे हम।।           अब आखिरी ग़ज़ल         


 बहर रमल मुसम्मन महजूफ


 छोड़ कर शर्मोहया वो बात करते यार की


 बेवफ़ाई खून में है बात करते प्यार की।।


           


शर्म से उनका कभी रिश्ता कोई होता नहीं


मकतलो में बैठ कर दें जो दुहाई प्यार की।।


 


और उनका है नहीं इंसानियत से वास्ता


चंद पैसों के लिए काटेंगे गर्दन यार की।।


 


मुल्क की ऐसी फिज़ा पहले कभी देखी न थी


हाथ में है छूरिया पर बात करते प्यार की।।


 


बढ़ गई है मांग कितनी देख दूल्हों की यहां


साइकिल घर में नहीं है,बात करते कार की।।


 


मर न जाऊं इस ख़ुशी से ए खुदा मुझको बचा


आज मेरा यार मुझको दे सदाए प्यार की      


      कहने का आशय कि श्री पंकज कुमार सोनी की ग़ज़लों की धार ही अलग है। मीडिया प्रभारी पंकज सोनी जी को ग़ज़ल पढ़ते हुए सुनना, ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) में उपस्थित सभी श्रोताओं के लिये एक नया अनुभव था। उनकी ग़ज़लों को सुनकर तो श्रोतागण भावविभोर हो गये। उनकी वाह-वाह के साथ तारीफ़ की झड़ी लग गयी।उनकी धारदार ग़ज़लों से महफ़िल का वातावरण बेहद जीवंत हो गया और बार-बार पेज पर तालियों की बौछार होती रही तथा कैसे एक घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। मंत्रमुग्ध होकर हम सभी अपने समय के इस महत्वपूर्ण ग़ज़लगो मोहतरम पंकज सोनी साहब को सुनते रहे, पर दिल है कि भरा नहीं।


इस तरह कहा जा सकता है कि अपनी धारदार रूमानी शैली में अपनी बेहतरीन ग़ज़लें सुनाकर श्री सोनी' जी ने सभी श्रोताओं का दिल जीत लिया, यानी कि महफ़िल लूट ली।


डाॅ पंकज सोनी जी के बारे में एक ख़ास बात ये है कि वो ऐसे शख़्स हैं जो हर सेशन का अभिन्न हिस्सा हैं, ये महफ़िल के प्रचार सचिव की अनौपचारिक भूमिका निभा रहे हैं। हर गतिविधि की विस्तृत और दिलचस्प रिपोर्ट छापते हैं। इसके अतिरिक्त वो ग्रुप में सबसे अधिक सक्रिय सदस्यों में से एक हैं।


डाॅ पंकज सोनी ' जी के फ़ेसबुक लाइव देखने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें 


https://www.facebook.com/groups/1108654495985480/permalink/1509316075919318/


   लाइव@ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के नाम से चर्चित फेसबुक के इस लाइव कार्यक्रम की विशेषता यह है कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले से ही, शाम 4 बजे से ही दर्शक-श्रोता पेज पर जुटने लगते हैं और कार्यक्रम की समाप्ति तक मौज़ूद रहते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ, महफ़िल की 26वीं कड़ी के रूप में डाॅ पंकज सोनी जी जब तक अपना कलाम सुनाते रहे, रसिक दर्शक और श्रोतागण महफ़िल में जमे रहे।


"पंकज-गोष्ठी न्यास (पंजीकृत) द्वारा आयोजित "लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली)" के इस कार्यक्रम का समापन टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) की ओर से डाॅ अमर पंकज जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।



कार्यक्रम के संयोजक और ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के एडमिन डाॅ अमर पंकज ने लाइव प्रस्तुति करने वाले शायर डाॅ सोनी जी को इस महफिल के मीडिया प्रभारी भी है के साथ-साथ दर्शकों-श्रोताओं के प्रति भी आभार प्रकट करते हुए सबों से अनुरोध किया कि महफ़िल के हर कार्यक्रम में ऐसे ही जुड़कर टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) का उत्साहवर्धन करते रहें।


डाॅ अमर पंकज ने टीम लाइव @ ग़ज़लों की महफ़िल (दिल्ली) के सभी साथियों, डाॅ दिव्या जैन जी , डाॅ यास्मीन मूमल जी, श्रीमती रेणु त्रिवेदी मिश्रा जी, श्री अनिल कुमार शर्मा 'चिंतित' जी, श्री पंकज त्यागी 'असीम' जी और डाॅ पंकज कुमार सोनी जी के प्रति भी अपना आभार प्रकट करते हुए उन्हें इस सफल आयोजन-श्रृंखला की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित की।


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